Thursday, June 30, 2022

Justice for Kanhaiyalal (UDAIPUR CASE)


 When we say terrorism has no religion, we mean it. We are just thinking of people who suffer because of some bad minds.


 Just think of his family. His wife and children. Kanhailya was the 'only' earning person of the family and now he is no more. Let's come forward and help him.


 

They belong to no religion, they are just inhuman, think of a single way which leads to inhumanity.


 can you help them? yes, just scan the following image and pay whatever you want. even a small donation can give a big relief to this family collectively. The rule is one only- one for all and all for one.


Tuesday, June 15, 2021

राम के नाम पर

 यूँ तो मै किसी राजनीतिक पार्टी या धर्म विशेष के नाम पर कुछ लिखता नहीं पर आज जब मुझे लगता है मेरे देशवासी हर तरह से आँखें मूंदे और रेत में सर गडाए ही रहना चाहते हैं तो फिर लिखना बनता है क्योंकि बात उस देश की है जहाँ दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या निवास करती है. यहाँ ये भी बता दूं कि भारतीय जनता पार्टी के बारे में तथ्य बताने का अर्थ ये बिलकुल नहीं कि मै किसी और पार्टी का पक्ष लेना चाहता हूँ या फिर किसी और नेता को इनके नेताओं से ऊपर बताना चाहता हूँ क्योंकि मेरी ये पोस्ट तुलनात्मक नहीं व्याख्यात्मक है .

पहली बात तो ये कि आप ज़रा आँकड़े देखें - 

१- १९९१ के बाद बेरोजगारी का सबसे बड़ा प्रतिशत 

२- विश्व में भुखमरी के मामले में १०७ देशों में भारत का ९४ वां स्थान 

३- भ्रष्टाचार के मामले में ४० अंक पाकर १८० देशों में भारत का ८६वां स्थान 

४- भारत की अपेक्षित आर्थिक वृद्धि का अनुमान तो ऋणात्मक भी लगाया है विश्व की बेहतरीन आर्थिक संस्थाओं ने .

५- विश्व में सबसे बदतर तरीके से अगर कोरोना की रोकथाम यदि कहीं की गयी तो वो भारत में. इस मामले में नेपाल, भूटान और बंगलादेश जैसे देश भी हमसे आगे खड़े थे.

५- पिछले सात वर्षों में देश  पर सर्वाधिक आतंकी हमले हुए और विदेशियों ने घुसपैठ की कोशिश की जिसमे चीन जैसा शक्तिशाली देश ही नहीं नेपाल जैसा छोटा देश भी शामिल है. 

६- महंगाई की तो हालत ये है कि आजादी के बाद से ये उच्चतम स्तर पर है. ये हाल तो तब है जब लोगों की जेब में खाना भी खरीदने के पूरे पैसे नहीं हैं.

कोरोना काल में कितने ही लोगों की जान गयी और कितने ही लोगों का रोजगार छिना पर सरकार का टैक्स ज़रा भी कम नहीं हुआ क्योंकि सरकार ने किसी भी तरह का टैक्स नहीं रोका, कोई बिल नहीं छोड़ा और अपनी कमाई के जरिये में कुछ भी ऐसा नहीं किया कि लोगों को लगे कि उन्हें राहत दी गयी. प्रधानमन्त्री जी ने बीस लाख करोड़ का पॅकेज देने की बात की वो केवल बात ही थी पर उसमे से किसी को बीस रूपये भी मिले या नहीं, ये आज तक स्पष्ट नहीं हुआ. बात सीधी सी है....देश बर्बाद हो रहा है और हमे समझाया जा रहा है 

१- अगर आप सरकार के खिलाफ कुछ कहेंगे तो आप देशद्रोही हैं 

२- भाजपा केखिलाफ कुछ कहना हिन्दू धर्म के खिलाफ है.

३- अगर ये सरकार गयी तो हिन्दुओं को खत्म कर दिया जाएगा और उनकी माँ बहनों का बलात्कार किया जाएगा.

४- प्रधानमन्त्री देव पुरुष हैं और उन पर संदेह करना या व्यंग्य करना मानवता के प्रति अपराध है. 

५- साथ ही हमेशा तुलनात्मक अध्ययन पर बात आ जाती है जैसे यदि ये गए तो कौन आयेगा बाकी पार्टियों ने इतने साल में क्या किया...वगैरा....वगैरा.....

तो इस बारे में मुझे यही कहना है कि हिन्दू धर्म इतना नाजुक और कमजोर भी नहीं कि वो एक पार्टी या एक सरकार की दया पर अपना अस्तित्व बचाने की सोचने लगे. कितने ही आतताइयों और आक्रमणकारियों का मुकाबला करके भी इस धर्म ने अपने आप को अक्षुण रखा है. लोगों में ये भ्रम फैलाने का कारण केवल उनका ध्यान मुख्या मुद्दों से दूर रखना है. पर मेरा आप सभी से हाथ जोड़ कर अनुरोध है कि इस तरह खुद को बर्बादी की ओर न ले जाएँ. सरकार के अच्छे काम की प्रशंसा करें परन्तु उसके गलत कामों की निंदा भी उतनी ही आवश्यक है. प्रश्न किसी पार्टी, सरकार या व्यक्ति का नहीं, हमारे देश का है...और देश इन सबसे ऊपर था और रहेगा.

Monday, September 3, 2018

सामान्य वर्ग का चमत्कारी पुरुष

यदि आप पुरुष हैं...
यदि आप सामान्य वर्ग से हैं..
यदि आप परिवार चलाने लायक कमा रहे हैं.....
तो ये मानिए कि रोज कम से कम १०० रूपये का प्रसाद तो मंदिर में चढ़ा ही दिया करें क्योंकि आप जेल से बाहर हैं, यही कम नहीं है.
ज़रा सोचिये अभी एक व्यक्ति आपकी ओर ऊँगली उठा कर आरोप लगा दे कि
'इसने मुझे जातिसूचक शब्द कहे'....
या फिर कोई भी महिला बोल दे-
'इसने मेरे साथ बलात्कार किया'
और तो और आपकी अपनी पत्नी या उसके घर वालों में से कोई शादी के बीस साल बाद भी कह दे कि आप उनसे दहेज मांग रहे हैं तो आपसे पूछताछ बाद में होगी, पहले आपको जेल में ठूंस दिया जाएगा.
और ये सीधे सीधे गुंडागर्दी वाले कानूनों में ताकत इतनी है कि कोई सरकार इन्हें हटा तो क्या, हिला भी नहीं पाई है. आपमें से कुछ लोग पार्टियों के नज़रिए से इसे देखेंगे तो कुछ सामजिक समरसता जैसी बात करेंगे. तो आप लोगों से अनुरोध है कि कान किधर से पकड़ लें....सच्चाई ज़रा नहीं बदलने वाली.
ज़रा सोचिये, क्या गुज़रती होगी उस व्यक्ति पर जो सवर्ण है और पुरुष है. देखा जाए तो सबसे असुरक्षित है वो. क्रोध करने का तो अधिकार खत्म ही हो गया उसका, कभी भी कोई भी आकार उसकी इज्ज़त उतार दे फिर वो भले ही उसकी अपनी पत्नी ही क्यों न हो.
और ये भी वही सिद्ध करे कि वो निर्दोष है. 
यही नहीं, परेशानियां और भी हैं. आप कमा रहे हैं, ये भी चमत्कार से कम नहीं है. आपकी जबरदस्त मेधा का चमत्कार ही है कि आप एक तगड़ी प्रतियोगिता जीत कर यहाँ पहुँच गए. उनकी छोड़ दें जो ४०% पाकर भी आपसे ऊँची नौकरियां पा गए. वो तो प्रमोशन भी आपसे पहले पा लेंगे. 
कल कुछ बेहतर होगा, ये सोचना छोड़ दें. आपकी आने वाली संताने भी इसी भय के साये में पलेंगी.

Sunday, May 8, 2016

जान लेती अपेक्षाएं

कुछ ऐसी ही एक पोस्ट मैंने कुछ दिनों पहले की थी जिसमे मैंने ये बताने की कोशिश की थी कि भारतीय माता पिता आज भी वही पुराने अवसरों जैसे, डॉक्टर, इंजिनियर और प्रशासनिक अधिकारी बनाने के लिए अपने बच्चों को प्रेरित कर रहे हैं जबकि इस वैश्विक युग की सच्चाई ये है कि पता नहीं कितने रोजगार के ऐसे और अवसर शुरू हो चुके हैं जो  उपरोक्त अवसरों से कई गुना बेहतर हैं.
आज मुझे फिर इसी विषय पर लिखने को मजबूर होना पड़ा जब मैंने अखबार में खबर पढ़ी कि राजस्थान के कोटा शहर के कोचिंग संस्थान के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली. कोटा में अब तक बहुत से छात्र छात्रा आत्महत्या कर चुके हैं और अधिकतर के सुसाइड नोट बताते हैं कि उन्होंने माता-पिता की अपेक्षाएं न पूरी कर पाने के दुःख में दुनिया से ही किनारा कर लिया.
ये अपेक्षाएं तो दरअसल तभी से देखी जा सकती हैं जब से बच्चा स्कूल में दाखिला लेता है. 'कक्षा में अंकों के आधार पर बच्चे का कौन सा स्थान है'- ये प्रश्न माता पिता को इतना विचलित किये रहता है कि लगता है अगर मौका दिया जाए तो बच्चे के स्थान पर वो स्वयं परीक्षा देने न आ जाएँ. अगर आप भी माता पिता है और अपने बच्चे का अंकपत्र लेने उसके स्कूल गए हैं तो कुछ देर वहाँ रुकिए और आप पायेंगे कि अधिकाँश माता पिता बस उनका बच्चा अधिक से अधिक अंक कैसे लाये को लेकर ही बहुत चिंतित हैं. कोई नहीं पूछता कि मेरा बच्चा खेल में कैसा है, तर्क वितर्क या गीत संगीत में रूचि तो दूर की बात है. बच्चा होशियार है या नहीं- अरे ये भी कोई पूछने की बात है! उसका अंकपत्र देख लो, पता लग जाएगा. मतलब कि अंकपत्र तो बच्चे के दिमाग के मीटर की रीडिंग है. जितने ज्यादा अंक, उतना होशियार बच्चा.
माता पिता होना एक सुखद अनुभव होता है और बच्चों की परवरिश कोई आसान नहीं होती. बिना अपेक्षा के दुनिया में बहुत कम कार्य ही किये जाते हैं और अगर कोई माता पिता अपने बच्चे से कुछ अपेक्षा करते हैं तो वो किसी भी प्रकार से गलत नहीं है.
लेकिन....
१-ये 'कुछ' कुछ न रह कर 'सब कुछ' बन जाता है.
२-हर जगह कुछ अतिरिक्त प्रतिभावान बच्चे होते हैं. उनसे अपने बच्चे की तुलना उसका  मनोबल गिराना ही है.
३-बच्चे किसी न किसी क्षेत्र में अवश्य बेहतर होंगे. उनकी वो प्रतिभा ढूँढ निकालें.
४-आपकी अपेक्षाएं वो ऊर्जा होनी चाहियें जो उसे ऊपर जाने को प्रेरित करें न कि पत्थर जो उसे डर के मारे आगे ही न बढ़ने दें.
चलिए आपसे कुछ प्रश्न करते हैं -
१-आप हर  वर्ष  टॉपर्स की लिस्ट अखबार में देखते हैं. क्या आपको पिछले टॉपर्स का नाम याद है?
२-आपने कभी भी किस ऊँची नौकरी करने वाले मशहूर व्यक्ति के बारे में ये सुना है कि ये अपने जिले छोडो, स्कूल का भी बेहतरीन छात्र या छात्रा रहा हो.
३-इतिहास से ऐसे दस नाम ढूँढ कर निकालिए जो अपनी शिक्षा के कारण मशहूर हुए हों.
४-क्या आप स्वयं वही बनने के सपने देखते थे जो आज आप अपनी संतान को बनाना चाहते हैं?
                                   उम्मीद है आप समझ गए होंगे कि आप दरअसल बच्चे को आगे बढ़ना देखना चाहने के बहाने उस पर वो इच्छाएं थोप रहे हैं जो आपके मन में रह गईं. इस तरह से बच्चा उस दिशा में भी कुछ नहीं कर पा रहा जहाँ वो कर सकता है और आपकी दिखाई गई राह पहले ही उसके लिए दुष्कर है.
तो अब मेरा अनुरोध है.बच्चे  को स्वयं विकसित होने दें, उसकी पसंद और  नापसंद पर नजर रखें. उसे उसी दिशा में प्रोत्साहन दें जिस दिशा में उसका रुझान है. विशवास कीजिये, आज हर क्षेत्र में बहुत अवसर हैं.
और एक भरोसा और रखें-
'आपका बच्चा पड़ोसी और मोहल्ले का ही नहीं, शहर का सबसे बेहतरीन बच्चा है. और भारत का भी.'




Saturday, May 7, 2016

पीछे धक्का मारती गिनती

भारत किसी और मामले में हो न हो, जनसँख्या के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर तो है ही. इस मामले में चीन पहले नंबर पर आता है जहाँ की जनसँख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है.
इस नंबर खेल को समझने से पहले ये भी समझ लें कि चीन दुनिया में क्षेत्रफल के अनुसार दूसरे स्थान पर है और भारत सातवें. तो ऐसे समझिए कि जनसँख्या घनत्व यानि प्रति किलोमीटर बसने वाले लोगों की संख्या के अनुसार तो भारत पहले स्थान पर ही है.
अब इन दोनों देशों की इच्छाशक्ति पर भी ध्यान दें जरा. चीन ने वर्षों पहले बढ़ती जनसँख्या के खतरे को भांप लिया था और १९९० में ही ये कानून लागू कर दिया था कि जिस दंपत्ति के भी एक से अधिक बच्चे होंगे, उसे न केवल कई तरह के कर चुकाने होंगे बल्कि उसके लिए कई प्रतिबन्ध भी लागू होंगे. इसके विपरीत अगर केवल एक ही बच्चा है तो उसका पूरा ध्यान सरकार रखेगी.
अब भारत में एक तो छोडो, कोई तीन या चार बच्चों तक पर ये कानून लाकर दिखा दे. कानून की भी बात मत कीजिये, कोई केवल ये कह कर ही दिखा दे कि हमें बच्चे कम पैदा करने चाहियें और ये देश की सेहत के लिए अच्छा नहीं है.
हमारे यहाँ तो 'जिसने मुहँ दिया है वो खाने को दाना भी देगा' की तर्ज़ पर जितने बच्चे पैदा कर लिए जाएँ कम हैं. पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी 'बस एक लड़का हो जाए' के चक्कर में दो तो पैदा कर ही लेता है. लड़कियों के प्रति समाज का रवैया भी इसका कारण है.
अब ज्यादा संताने समाज में अपराध, भ्रष्टाचार और भुखमरी का शुरूआती कारण हो सकती हैं. अधिक लोग मतलब अधिक बेरोजगारी. समाज में बढ़ती रोटी और रोज़गार की प्रतिस्पर्धा का मूल कारण.
साथ ही ये एक ऐसा विषय है जिस पर किये गए कार्य का परिणाम वर्षों बाद दिखाई पड़ता है. चीन में भी २०१६ में जनता को दो बच्चों की इजाजत मिली है. तो भारत में शुरू किया गया कोई भी प्रयास वर्षों बाद अपने रंग दिखायेगा.
वो भी तब जब वो आज ही शुरू कर दिया जाए.



Friday, May 6, 2016

अब भी उतने ही अंधविश्वासी

'छींक आ गई तो रुक जाओ अभी'
'कांच टूटना अशुभ है.'
'तेरहवीं मंजिल पर मकान नहीं लेंगे.'
'बिल्ली रास्ता काट गई. थोड़ी देर बाद निकलना.'
इतने, इतने, इतने समय बाद भी हम उतने ही अंधविश्वासी हैं जितने सैकड़ों वर्ष पहले हुआ करते थे. तकनीक आ गई है और हम हम कहीं ज्यादा वैश्विक हो गए हैं. तो हमने इस वैश्विकता से क्या सीखा? सीखा न! अब हमने  विश्व भर के अंधविश्वासों को अपने दैनिक जीवन में शामिल कर लिया है.
मुझे कभी इस अन्धविश्वास का कारण नहीं समझ आया. मुझे तो लगता है कि अगर आप किसी भी प्रकार से ईश्वर में विश्वास करते हैं और उसे सर्वशक्तिमान मानते हैं तो फिर आप किसी भी प्रकार की 'होनी' या 'अनहोनी' को कैसे बदल सकते हैं? अगर आप ऐसा करने का प्रयास भी कर रहे हैं तो ये परोक्ष रूप से ईश्वर की सत्ता में दखल ही हुआ.
शादी होगी, कुंडली देख कर. दुकान खुलेगी, मुहूर्त देख कर. नेताजी चुनाव का परचा भरेंगे, शुभ लग्न में. गंडे, तावीज़, पत्थर, धागा, टोटका, मन्त्र, झाड़-फूंक क्या उपाय नहीं करते हम केवल इसलिए कि हम उन सभी दुर्योगों से बच जाएँ जो हम पर आने वाले हैं. परिणाम यही होता है कि हमें हमारे भविष्य के दुर्भाग्य से बचाने या कम से कम उसकी मार का असर कम करने वाले 'ठेकेदारों' की फ़ौज खड़ी हो गई है. इनकी कोई जवाबदेही नहीं होती, ये आपको इस प्रकार से बातें बताते हैं कि भविष्य में उन शब्दों के कई अर्थ बनने की गुंजाईश बनी रहे. लागत कुछ नहीं और मुनाफा चकाचक.
फिर से सोचिये, ईश्वर की इच्छा हम बदल नहीं सकते और आने वाले दुर्भाग्य या सौभाग्य किसी को भी टाल नहीं सकते. हम तो बस एक काम कर सकते हैं, वो है अपना कर्म. अगर किसी भी प्रकार से आने वाला बुरा वक़्त टल सकता तो आज कोई भी भारतीय किसी भी प्रकार से दुखी ना होता और न ही किसी पर कोई विपदा आई होती. अन्धविश्वास, एक तर्कहीन और बेतुका विश्वास है जो हमारे मस्तिष्क में भय बन कर वास करता है. इससे न केवल हमारा जीवन बल्कि हमसे जुड़े लोगों का जीवन भी प्रभावित होता है. ध्यान रखिये, अच्छे काम शुरू करने के लिए कोई भी मुहूर्त शुभ होता है और गलत काम की शुरुआत के लिए कोई भी समय सही नहीं होता.
उम्मीद है आप सोचेंगे जरूर. भले ही उस काली बिल्ली के आँखों से ओझल हो जाने के बाद.





Thursday, May 5, 2016

खुशियाँ खंगालता दिखावा

क्या आपके घर में किसी का जन्मदिन है, शादी है या कोई ऐसा ही पारिवारिक उत्सव? हम भारतीय खुशियाँ मनाते हैं और जम कर मनाते हैं लेकिन ये विषय शोचनीय तब बन जाता है जब हम कुछ पल की खुशियों के लिए आगे का ध्यान रखना भूल जाते हैं.
भारत में शादियाँ धीरे धीरे एक बड़ा खर्चीला आयोजन बनती जा रही हैं. समस्या ये है कि इन्हें आपकी हैसियत से जोड़ा जाता है. मतलब ये कि जितनी शानदार शादी, उतना ही ज्यादा आपका रुतबा. इसका परिणाम ये हो रहा है कि लोग कर्ज लेकर भी शादियों में खर्च करने से गुरेज़ नहीं कर रहे हैं. जो लोग पहले ही पैसे वाले हैं, वो भी अपने जमा जोड़े का एक बड़ा हिस्सा शादियों में खर्च कर देते हैं.
भारत एक विशाल जनसँख्या वाला देश है और अगर यहाँ जनमानस से जुड़ी कोई भी हवा फैलती है तो ये बढ़ी हुई जनसंख्या उसे आंधी में बदल देती है. ऐसे में जिस देश में हजारों की संख्या में रोज शादियाँ हो रही हों और हर शादी में कुछ हजार की फिजूलखर्ची भी जोड़ ली जाए तो ये रोजाना करोणों की रकम बैठती है.
शादी तो शादी, सगाई, जन्मदिन, वर्षगाँठ यहाँ तक कि मृत्युभोज भी भारतीयों की नाक बन गया है मानो. यहाँ कमी हुई नहीं और आपकी जीवन भर की प्रतिष्ठा गई नहीं. हम भूल जाते हैं कि जीवन कभी रुकता नहीं. ये हर शादी, सगाई, जन्मदिन और अन्य त्योहारों के बाद भी चलता रहता है. अगर अपने सभी संसाधन इसी पर लुटा देंगे तो आगे हमें किसी के आगे हाथ फैलाना पड़ सकता है. चलिए, मान लेते हैं कि आप बहुत पैसे वाले हैं और आपके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता. पर क्या आपने कभी एक बार भी सोचा है कि जितनी रकम आपके घरेलु समारोह में 'अतिरिक्त' के रूप में खर्च हो गई वो कितने ही लोगों के लिए एक थाती थी? खुशियाँ तो वही हैं जो सबके साथ मनाई जाएँ. आपकी ओर से बढ़े मदद के हाथ किसी और की शादी करवा सकते थे या फिर एक गरीब बच्चे को स्कूल में पढ़ा सकते थे.
पर आपको अभी ये ही अफ़सोस हो रहा है कि पचास लाख वाला बारातघर लेना पड़ा.....
अगर 'महंगा वाला बारातघर' पहले से बुक न होता तो इस 'सस्ते' से काम चलाते भला?????