Sunday, May 8, 2016

जान लेती अपेक्षाएं

कुछ ऐसी ही एक पोस्ट मैंने कुछ दिनों पहले की थी जिसमे मैंने ये बताने की कोशिश की थी कि भारतीय माता पिता आज भी वही पुराने अवसरों जैसे, डॉक्टर, इंजिनियर और प्रशासनिक अधिकारी बनाने के लिए अपने बच्चों को प्रेरित कर रहे हैं जबकि इस वैश्विक युग की सच्चाई ये है कि पता नहीं कितने रोजगार के ऐसे और अवसर शुरू हो चुके हैं जो  उपरोक्त अवसरों से कई गुना बेहतर हैं.
आज मुझे फिर इसी विषय पर लिखने को मजबूर होना पड़ा जब मैंने अखबार में खबर पढ़ी कि राजस्थान के कोटा शहर के कोचिंग संस्थान के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली. कोटा में अब तक बहुत से छात्र छात्रा आत्महत्या कर चुके हैं और अधिकतर के सुसाइड नोट बताते हैं कि उन्होंने माता-पिता की अपेक्षाएं न पूरी कर पाने के दुःख में दुनिया से ही किनारा कर लिया.
ये अपेक्षाएं तो दरअसल तभी से देखी जा सकती हैं जब से बच्चा स्कूल में दाखिला लेता है. 'कक्षा में अंकों के आधार पर बच्चे का कौन सा स्थान है'- ये प्रश्न माता पिता को इतना विचलित किये रहता है कि लगता है अगर मौका दिया जाए तो बच्चे के स्थान पर वो स्वयं परीक्षा देने न आ जाएँ. अगर आप भी माता पिता है और अपने बच्चे का अंकपत्र लेने उसके स्कूल गए हैं तो कुछ देर वहाँ रुकिए और आप पायेंगे कि अधिकाँश माता पिता बस उनका बच्चा अधिक से अधिक अंक कैसे लाये को लेकर ही बहुत चिंतित हैं. कोई नहीं पूछता कि मेरा बच्चा खेल में कैसा है, तर्क वितर्क या गीत संगीत में रूचि तो दूर की बात है. बच्चा होशियार है या नहीं- अरे ये भी कोई पूछने की बात है! उसका अंकपत्र देख लो, पता लग जाएगा. मतलब कि अंकपत्र तो बच्चे के दिमाग के मीटर की रीडिंग है. जितने ज्यादा अंक, उतना होशियार बच्चा.
माता पिता होना एक सुखद अनुभव होता है और बच्चों की परवरिश कोई आसान नहीं होती. बिना अपेक्षा के दुनिया में बहुत कम कार्य ही किये जाते हैं और अगर कोई माता पिता अपने बच्चे से कुछ अपेक्षा करते हैं तो वो किसी भी प्रकार से गलत नहीं है.
लेकिन....
१-ये 'कुछ' कुछ न रह कर 'सब कुछ' बन जाता है.
२-हर जगह कुछ अतिरिक्त प्रतिभावान बच्चे होते हैं. उनसे अपने बच्चे की तुलना उसका  मनोबल गिराना ही है.
३-बच्चे किसी न किसी क्षेत्र में अवश्य बेहतर होंगे. उनकी वो प्रतिभा ढूँढ निकालें.
४-आपकी अपेक्षाएं वो ऊर्जा होनी चाहियें जो उसे ऊपर जाने को प्रेरित करें न कि पत्थर जो उसे डर के मारे आगे ही न बढ़ने दें.
चलिए आपसे कुछ प्रश्न करते हैं -
१-आप हर  वर्ष  टॉपर्स की लिस्ट अखबार में देखते हैं. क्या आपको पिछले टॉपर्स का नाम याद है?
२-आपने कभी भी किस ऊँची नौकरी करने वाले मशहूर व्यक्ति के बारे में ये सुना है कि ये अपने जिले छोडो, स्कूल का भी बेहतरीन छात्र या छात्रा रहा हो.
३-इतिहास से ऐसे दस नाम ढूँढ कर निकालिए जो अपनी शिक्षा के कारण मशहूर हुए हों.
४-क्या आप स्वयं वही बनने के सपने देखते थे जो आज आप अपनी संतान को बनाना चाहते हैं?
                                   उम्मीद है आप समझ गए होंगे कि आप दरअसल बच्चे को आगे बढ़ना देखना चाहने के बहाने उस पर वो इच्छाएं थोप रहे हैं जो आपके मन में रह गईं. इस तरह से बच्चा उस दिशा में भी कुछ नहीं कर पा रहा जहाँ वो कर सकता है और आपकी दिखाई गई राह पहले ही उसके लिए दुष्कर है.
तो अब मेरा अनुरोध है.बच्चे  को स्वयं विकसित होने दें, उसकी पसंद और  नापसंद पर नजर रखें. उसे उसी दिशा में प्रोत्साहन दें जिस दिशा में उसका रुझान है. विशवास कीजिये, आज हर क्षेत्र में बहुत अवसर हैं.
और एक भरोसा और रखें-
'आपका बच्चा पड़ोसी और मोहल्ले का ही नहीं, शहर का सबसे बेहतरीन बच्चा है. और भारत का भी.'




Saturday, May 7, 2016

पीछे धक्का मारती गिनती

भारत किसी और मामले में हो न हो, जनसँख्या के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर तो है ही. इस मामले में चीन पहले नंबर पर आता है जहाँ की जनसँख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है.
इस नंबर खेल को समझने से पहले ये भी समझ लें कि चीन दुनिया में क्षेत्रफल के अनुसार दूसरे स्थान पर है और भारत सातवें. तो ऐसे समझिए कि जनसँख्या घनत्व यानि प्रति किलोमीटर बसने वाले लोगों की संख्या के अनुसार तो भारत पहले स्थान पर ही है.
अब इन दोनों देशों की इच्छाशक्ति पर भी ध्यान दें जरा. चीन ने वर्षों पहले बढ़ती जनसँख्या के खतरे को भांप लिया था और १९९० में ही ये कानून लागू कर दिया था कि जिस दंपत्ति के भी एक से अधिक बच्चे होंगे, उसे न केवल कई तरह के कर चुकाने होंगे बल्कि उसके लिए कई प्रतिबन्ध भी लागू होंगे. इसके विपरीत अगर केवल एक ही बच्चा है तो उसका पूरा ध्यान सरकार रखेगी.
अब भारत में एक तो छोडो, कोई तीन या चार बच्चों तक पर ये कानून लाकर दिखा दे. कानून की भी बात मत कीजिये, कोई केवल ये कह कर ही दिखा दे कि हमें बच्चे कम पैदा करने चाहियें और ये देश की सेहत के लिए अच्छा नहीं है.
हमारे यहाँ तो 'जिसने मुहँ दिया है वो खाने को दाना भी देगा' की तर्ज़ पर जितने बच्चे पैदा कर लिए जाएँ कम हैं. पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी 'बस एक लड़का हो जाए' के चक्कर में दो तो पैदा कर ही लेता है. लड़कियों के प्रति समाज का रवैया भी इसका कारण है.
अब ज्यादा संताने समाज में अपराध, भ्रष्टाचार और भुखमरी का शुरूआती कारण हो सकती हैं. अधिक लोग मतलब अधिक बेरोजगारी. समाज में बढ़ती रोटी और रोज़गार की प्रतिस्पर्धा का मूल कारण.
साथ ही ये एक ऐसा विषय है जिस पर किये गए कार्य का परिणाम वर्षों बाद दिखाई पड़ता है. चीन में भी २०१६ में जनता को दो बच्चों की इजाजत मिली है. तो भारत में शुरू किया गया कोई भी प्रयास वर्षों बाद अपने रंग दिखायेगा.
वो भी तब जब वो आज ही शुरू कर दिया जाए.



Friday, May 6, 2016

अब भी उतने ही अंधविश्वासी

'छींक आ गई तो रुक जाओ अभी'
'कांच टूटना अशुभ है.'
'तेरहवीं मंजिल पर मकान नहीं लेंगे.'
'बिल्ली रास्ता काट गई. थोड़ी देर बाद निकलना.'
इतने, इतने, इतने समय बाद भी हम उतने ही अंधविश्वासी हैं जितने सैकड़ों वर्ष पहले हुआ करते थे. तकनीक आ गई है और हम हम कहीं ज्यादा वैश्विक हो गए हैं. तो हमने इस वैश्विकता से क्या सीखा? सीखा न! अब हमने  विश्व भर के अंधविश्वासों को अपने दैनिक जीवन में शामिल कर लिया है.
मुझे कभी इस अन्धविश्वास का कारण नहीं समझ आया. मुझे तो लगता है कि अगर आप किसी भी प्रकार से ईश्वर में विश्वास करते हैं और उसे सर्वशक्तिमान मानते हैं तो फिर आप किसी भी प्रकार की 'होनी' या 'अनहोनी' को कैसे बदल सकते हैं? अगर आप ऐसा करने का प्रयास भी कर रहे हैं तो ये परोक्ष रूप से ईश्वर की सत्ता में दखल ही हुआ.
शादी होगी, कुंडली देख कर. दुकान खुलेगी, मुहूर्त देख कर. नेताजी चुनाव का परचा भरेंगे, शुभ लग्न में. गंडे, तावीज़, पत्थर, धागा, टोटका, मन्त्र, झाड़-फूंक क्या उपाय नहीं करते हम केवल इसलिए कि हम उन सभी दुर्योगों से बच जाएँ जो हम पर आने वाले हैं. परिणाम यही होता है कि हमें हमारे भविष्य के दुर्भाग्य से बचाने या कम से कम उसकी मार का असर कम करने वाले 'ठेकेदारों' की फ़ौज खड़ी हो गई है. इनकी कोई जवाबदेही नहीं होती, ये आपको इस प्रकार से बातें बताते हैं कि भविष्य में उन शब्दों के कई अर्थ बनने की गुंजाईश बनी रहे. लागत कुछ नहीं और मुनाफा चकाचक.
फिर से सोचिये, ईश्वर की इच्छा हम बदल नहीं सकते और आने वाले दुर्भाग्य या सौभाग्य किसी को भी टाल नहीं सकते. हम तो बस एक काम कर सकते हैं, वो है अपना कर्म. अगर किसी भी प्रकार से आने वाला बुरा वक़्त टल सकता तो आज कोई भी भारतीय किसी भी प्रकार से दुखी ना होता और न ही किसी पर कोई विपदा आई होती. अन्धविश्वास, एक तर्कहीन और बेतुका विश्वास है जो हमारे मस्तिष्क में भय बन कर वास करता है. इससे न केवल हमारा जीवन बल्कि हमसे जुड़े लोगों का जीवन भी प्रभावित होता है. ध्यान रखिये, अच्छे काम शुरू करने के लिए कोई भी मुहूर्त शुभ होता है और गलत काम की शुरुआत के लिए कोई भी समय सही नहीं होता.
उम्मीद है आप सोचेंगे जरूर. भले ही उस काली बिल्ली के आँखों से ओझल हो जाने के बाद.





Thursday, May 5, 2016

खुशियाँ खंगालता दिखावा

क्या आपके घर में किसी का जन्मदिन है, शादी है या कोई ऐसा ही पारिवारिक उत्सव? हम भारतीय खुशियाँ मनाते हैं और जम कर मनाते हैं लेकिन ये विषय शोचनीय तब बन जाता है जब हम कुछ पल की खुशियों के लिए आगे का ध्यान रखना भूल जाते हैं.
भारत में शादियाँ धीरे धीरे एक बड़ा खर्चीला आयोजन बनती जा रही हैं. समस्या ये है कि इन्हें आपकी हैसियत से जोड़ा जाता है. मतलब ये कि जितनी शानदार शादी, उतना ही ज्यादा आपका रुतबा. इसका परिणाम ये हो रहा है कि लोग कर्ज लेकर भी शादियों में खर्च करने से गुरेज़ नहीं कर रहे हैं. जो लोग पहले ही पैसे वाले हैं, वो भी अपने जमा जोड़े का एक बड़ा हिस्सा शादियों में खर्च कर देते हैं.
भारत एक विशाल जनसँख्या वाला देश है और अगर यहाँ जनमानस से जुड़ी कोई भी हवा फैलती है तो ये बढ़ी हुई जनसंख्या उसे आंधी में बदल देती है. ऐसे में जिस देश में हजारों की संख्या में रोज शादियाँ हो रही हों और हर शादी में कुछ हजार की फिजूलखर्ची भी जोड़ ली जाए तो ये रोजाना करोणों की रकम बैठती है.
शादी तो शादी, सगाई, जन्मदिन, वर्षगाँठ यहाँ तक कि मृत्युभोज भी भारतीयों की नाक बन गया है मानो. यहाँ कमी हुई नहीं और आपकी जीवन भर की प्रतिष्ठा गई नहीं. हम भूल जाते हैं कि जीवन कभी रुकता नहीं. ये हर शादी, सगाई, जन्मदिन और अन्य त्योहारों के बाद भी चलता रहता है. अगर अपने सभी संसाधन इसी पर लुटा देंगे तो आगे हमें किसी के आगे हाथ फैलाना पड़ सकता है. चलिए, मान लेते हैं कि आप बहुत पैसे वाले हैं और आपके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता. पर क्या आपने कभी एक बार भी सोचा है कि जितनी रकम आपके घरेलु समारोह में 'अतिरिक्त' के रूप में खर्च हो गई वो कितने ही लोगों के लिए एक थाती थी? खुशियाँ तो वही हैं जो सबके साथ मनाई जाएँ. आपकी ओर से बढ़े मदद के हाथ किसी और की शादी करवा सकते थे या फिर एक गरीब बच्चे को स्कूल में पढ़ा सकते थे.
पर आपको अभी ये ही अफ़सोस हो रहा है कि पचास लाख वाला बारातघर लेना पड़ा.....
अगर 'महंगा वाला बारातघर' पहले से बुक न होता तो इस 'सस्ते' से काम चलाते भला?????




Monday, May 2, 2016

आज भी आले और यंत्र के पीछे

पोस्ट मई २०१६ में लिखा जा रहा है. दुनिया भर में नए व्यापार, व्यवसाय और नौकरियां पनप रही हैं. ऐसा नहीं है कि भारत इनसे अछूता है. लेकिन आज भी आप किसी भारतीय माता-पिता से पूछेंगे कि वो अपने बच्चों को क्या बनाना चाहेंगे तो आधे से अधिक का उत्तर 'डॉक्टर, इंजिनियर या आई.ए.एस. और पी.सी.एस.' ही होगा.
क्यों? दरअसल ये हमारे दिमागों में रहते हैं. हम कुछ खास नौकरियों या व्यवसाय के बारे में ही सोच पाते हैं. शायद इसी का असर है कि हजारों कॉलेज खुल गए जहाँ लाखों विद्यार्थी सपने लिए जाते हैं और लाखों रूपये खर्च करके उन्हें पता लगता है कि अभी तो वो केवल उस नौकरी के काबिल हैं जो वो सामान्य स्नातक पूरा करके पा सकते थे. भला फिर उस अध्ययन का क्या लाभ जिसमे वो लाखों लगा चुके हैं?
यहाँ पर एक बड़ा दोष माता-पिता के हिस्से में भी जाता है. बहुत कम माता-पिता ऐसे हैं जो अपने बच्चे की रूचि को परख कर सही समय पर उसे सही दिशा में निर्देशित कर पाते हैं. जब फैसला लेने का समय होता है तब उसे 'बच्चा' समझा जाता है और जब वो जरा सा समझदार होता है तो वो पाता है कि जिस रास्ते पर उसे मुड़ना था वो तो बहुत पीछे रह गया.
भारत आगे बढ़ रहा है. नौकरियों और व्यवसाय के एक नहीं, एक हज़ार अवसर हैं. अपनी दृष्टि और सोच को इतना संकुचित न करें कि आपकी संतान 'ये नहीं तो कुछ नहीं' वाली स्थिति में पहुँच जाए बल्कि उसे इस प्रकार तैयार करें कि वो हर स्थिति से बेहतरीन पाने की स्थिति में हो. ये कोई बहुत कठिन बात नहीं. कोई काम छोटा नहीं होता और छोटे दिखाई पड़ने वाले कई काम वास्तव में बहुत मुनाफे का सुदा हो सकते हैं. इस बारे में मेरी ओर से कोई सुझाव या निर्देश नहीं, बस आप अपने आस पास ध्यान से देखिये. सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा.
पर वो समय तभी आएगा जब आप पड़ोसियों की संतानों से अपनी संतान को बेहतर समझना शुरू कर देंगे. ये तो वो रेस है जो मैदान से बाहर होकर आराम से जीती जा सकती है.



Sunday, May 1, 2016

जो दिखता है वो क्या है

आज मेरा इरादा आप सबका ध्यान उस तरफ आकर्षित करने का है जो हम और आप रोज देखते हैं पर कभी उसके अधोलिखित पक्ष पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि हमें उसकी आदत पड़ चुकी होती है. हाँ, हमें ये अंतर तब पता लगता है जब हम किसी विदेशी रमणीय स्थल की फोटो देखते हैं और बरबस ही बोल उठते हैं- 'वाह! क्या खूबसूरत जगह है.' या फिर भारत के किसी चुने हुए हिस्से को देख कर कह उठते हैं- 'इतना सुन्दर? ये भारत में ही है?'
'भारत का नहीं लगता.' कभी सोचा आपने ऐसा क्यों कहा? दरअसल हम भारत में बेतरतीब दृश्यों के आदि हो गए हैं. दुकानों के बाहर सड़कों पर निकले सामान, बेतरतीबी से लगे होर्डिंग, नियम कायदे तोड़ कर चलती भीड़, कहीं भी जगह घेर कर खड़े टेम्पो, ठेले और रिक्शेवाले. ऐसे दृश्य हमारे दिलों में बस चुके हैं. तभी तो तरतीब से लगा हुआ सामान और योजनाबद्ध, सुन्दर निर्माण हमें भौचक्का कर देता है.
मेरी नज़र में ये भी प्रदूषण का एक प्रकार है और मैंने इसे 'दृश्य प्रदूषण' का नाम दिया है. भारत में ये दृश्य प्रदूषण आम है. इतना सार्वजनिक कि हम एक सधे, सजे और त्रुटिरहित शहर की कल्पना भी मुश्किल से ही कर पायंगे. हमारे घर से ही शुरू कर सकते हैं. क्या घर के बाहर कपड़े टांगते हुए हम सोचते हैं? जहाँ जगह मिली, रस्सी बंधी और टंग गए कच्छे, बनियान उसके ऊपर. घर के बाहर क्यारी में भी इसका उदाहरण देखने को मिल जाएगा जहाँ यूँ लगता है मानो पौधों की क्यारी नहीं 'खिचड़ी' लगा रखी हो.
गाड़ी पार्किंग के लिए जहाँ जगह मिलेगी, लगा दी जायेगी.
साथ ही खुले बाजारों, मेलों और नुमाइशों की संस्कृति अपने लाचार प्रबंधन की वजह से आयोजन कम और 'भीड़-भडक्का, धक्कम-धक्का' ज्यादा बन जाती है.
इस प्रदूषण से भारत को बचाने के लिए हमें निर्माण स्तर से सोचना होगा. बेहतर बनाएँ और उसका बेहतरीन प्रबंधन करें. तभी तो दुनिया को भारत का सौंदर्य दिखेगा. और ये तथ्य तो आप सभी जानते हैं-
'जो दिखता है वो बिकता है.'





सबसे कम औकात की सेहत


भारत में विश्व के एक बड़े  मधुमेह रोगियों की संख्या रहती है. मोटापा हमारी अंतर्राष्ट्रीय बीमारी समझिए. साथ ही भूख और कुपोषण से ग्रसित लोगों का तो अच्छा खासा प्रतिशत है ही.
भूख और कुपोषण तो निर्धनता के कारण है और इसके लिए हमें अपने देश की आर्थिक विकास दर पर ध्यान देना होगा लेकिन मधुमेह और मोटापा एवं अनियमित स्वस्थ्य की समस्याएं तो निश्चित रूप से हमारी जीवन शैली की दें हैं. कुछ हद तक इसमें हमारे परमपरागत खाद्य पदार्थ भी शामिल हैं और साथ ही हमारी सेहत के प्रति लापरवाही भी.
जरा हमारे उन व्यंजनों पर ध्यान दें जो हमारे मुहँ में पानी ला देते हैं.
पूरी, कचौरी, हलवा, समोसा, जलेबी, मिठाइयां आदि. ये सब वास्तव में चीनी या तेल से पगे व्यंजन हैं जो दिल और सेहत के लिए अत्यंत नुकसानदायक हैं. दूसरा इन्हें बनाने का ढंग. अधिकतर ये एक ही तेल में बार बार तले जाते हैं और फिर जहर बन चुका वो तेल हमारी आँतों में उतर जाता है. वैसे सेहत के मानकों पर पिज्जा, नूडल्स और ब्रेड भी कम खतरनाक नहीं.



भारत में खाद्य मानकों का कितना ध्यान रखा जाता है इसका सबसे अच्छा उदाहरण कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले हुए सड़क किनारे खड़े ठेले हैं. लगभग सैकड़ों तरह के खाद्य पदार्थ बेचने वाले ये ठेले वाले न तो खाने की सफाई का ध्यान रखते हैं, न अपने बर्तनों की और न खुद की. सत्य तो ये है कि ये ठेले जीवाणुओं और कीटाणुओं की चलती फिरती दुकान हैं और अगर इनकी संख्या से अनुमान लगाया जाए तो भारत में करोणों लोग इनसे लिया खाना खाते हैं.
तीसरा कारण है हमारा जीवन जीने का ढंग. सुबह ब्रेड खाकर निकाल जाओ, दिन दो-चार समोसों या बिस्कुट के पैकेट पर निकाल दो और खाने का कोई नियत समय न होना. रही सही कसर इस वजह से पूरी हो जाती है कि कसरत के लिए हमारे पास दस मिनट का भी समय नहीं होता.
हल बहुत ही आसान है. अपने खाने का नियत समय बनाएँ और खाने के समय पर खाना ही खाएं, कुछ 'उल्टा सीधा' नहीं. अगर भागते दौड़ते, घर से बाहर खाने की नौबत आये तो किसी अच्छे होटल ढाबे या फिर फलों को तरजीह दें. देश के हालात के बारे में घंटों बहस करने के बाद या पहले दस मिनट अपने व्यायाम के लिए भी निकाल लें. दिन भर एक जगह बैठे न रहें, थोड़ा टहलें घूमे भी. ये उपाय इतने मुश्किल नहीं.
अपने गोलगप्पे खत्म होने के बाद इनके बारे में सोचियेगा जरूर. क्योंकि भारत की सेहत अच्छी होगी तो अच्छा दिमाग भी चलेगा.

Friday, April 29, 2016

जाग जाग कर सोता भारत

भारत के बहुत से राज्यों में इस समय सूखा पड़ रहा है. कई जगह लोगों को पानी के लिए मीलों चल कर जाना पड़ रहा है तो कई जगह पेट्रोल के भाव पर पानी खरीदना पड़ रहा है. ऐसे में इन राज्यों की सरकार अपने राज्यवासियों के बीच जनजागरूकता अभियान छेड़े हुए हैं जिसके द्वारा लोगों को पानी की बर्बादी रोकने, अधिकाधिक पानी बचाने और सार्वजानिक जल भंडारों की रक्षा करने का सन्देश दिया जा रहा है.
ऐसे कई जागरूकता अभियान मैंने अपने जीवन में देखे हैं. उनमे से कई तो ऐसे ही चलते हैं जैसे ऊपर दिया गया उदाहरण यानि जब आग लगे तब कुआँ खोदो. सत्य तो ये है कि अगर ये उपाय पहले ही अपना लिए गए होते तो शायद आज इस अभियान की आवश्यकता ही नहीं होती.
इसी तरह वृक्ष लगाओ अभियान, सफाई अभियान, ट्रैफिक जागरण, स्त्री सम्मान सप्ताह और पता नहीं कितने जागरूकता अभियान चलाये जाते हैं. मेरा ये कहना नहीं कि ये अभियान सफल नहीं होते या इनका कोई भी महत्व नहीं है किन्तु अधिकांशतः अभियान जागरूकता अभियान की जगह 'जाग कर रुक गए' अभियान बन कर रह जाते हैं. इसीका परिणाम है कि अभी तक हमने महिलाओं का सम्मान करना नहीं सीखा, सड़क पर चलने की तमीज नहीं सीखी और पेड़ों के महत्व को भी हम तभी समझ पाते हैं जब हमें अपना वहाँ उनकी छाया के नीचे खड़ा करना होता है. कुछ उदाहरण तो ऐसे हैं जहाँ जनता ने किये कराये को बदतर हालत में पहुंचा दिया जैसे पेड़ लगवा दिये गए पर उनका किसी ने ध्यान नहीं रखा. शौचालय बने रहे और लोग खेतों में शौच करते रहे. ट्रैफिक लाईट की ओर आँख उठा कर भी नहीं देखा और अपनी राह चलते रहे.
कहा गया है-'जब जागो, तब सवेरा'. बिलकुल ठीक बात है पर इस हिसाब से जब सो जाओ तब रात भी तो है. इसलिए, जागे ही हैं तो जागे रहिये. हर अभियान के बात हम और आप यूँ ही उसकी उपेक्षा कर देंगे तो भारत आगे कैसे बढ़ेगा? मैंने पहले भी जिक्र किया है कि ये सब तो भारत को बेहतर बनाने के लिए हमारे जीवन का हिस्सा होना चाहिए और इनमे से कई के लिए तो अभियान चलाने जैसा कुछ होना भी नहीं चाहिए. ये भावना तो हमारे ह्रदय में पहले से वास करनी चाहिए.
लगता है इन अभियानों की सफलता सुनिश्चित करने के लिए भी एक 'महा जागरूकता अभियान' चलाना पड़ेगा.



Thursday, April 28, 2016

बाहर आने को तरसती चिड़िया

कहा जाता है कि भारत कभी सोने की चिड़िया था लेकिन विदेशी आक्रमणकारी हमारा धन और ऐश्वर्य लूट कर ले गए. अब तो दुनिया के गरीबों और भुखमरों का एक बड़ा प्रतिशत भारत में रहता है.
अभी  बैठे बैठे पेपर पढ़ते हुए  एक खबर देखी कि एक साधारण से सरकारी  चपरासी  के घर में छापा पड़ा तो उसके पास ३६ करोड़ की संपत्ति पकड़ी गई. फिर एक सरकारी इंजिनियर के घर छापे  की खबर देखी. उसके
पास करीब १००० करोड़ की संपत्ति का अनुमान है .
 मेरा माथा ठनका. केवल दो लोगों के पास ही इतनी संपत्ति है तो भारत में तो ऐसे भ्रष्टाचारियों की  भरमार है. जाने अनजाने मन में ये हिसाब आने लगा कि अगर इन सबकी कुल संपत्ति मिला दी जाए तो कितनी होगी.
आइये आप भी मेरा ये हिसाब देखिये. शुरुआत एक जिले में इस प्रकार आमदनी करने वाले भ्रष्ट लोगों से करते हैं.
सबसे पहले सफेदपोश यानि समाज में रसूख बना कर रहने वाले और सभी तरह के अवैध धंधों में लिप्त लोगों से. इनके पुलिस और राजनीतिज्ञों दोनों से अच्छे सम्बन्ध होते हैं और इन्ही के बल पर ये रोज और अमीर होते जाते हैं.
तो मान लीजिए आपके जिले में ऐसे केवल दस लोग हैं जो प्रति माह १ करोड़ की अवैध आमदनी करते हैं.
पाँच ऐसे नेता हैं जो हर महीने १ करोड़ आराम से डकार जाते हैं.
टैक्स में खेल करके काले को सफ़ेद बनाने वाले कम से कम १० ऐसे व्यापारी भी हैं जिसमे से प्रत्येक प्रतिमाह १० लाख का तो खेल कर ही लेता है.
कम से कम १०० ऐसे सरकारी कर्मचारी जो ऐसे पदों पर बैठे हैं जहाँ से वो 'काम बनवाने', भुगतान देने, ठेका दिलवाने आदि के नाम पर प्रतिमाह १ लाख कमा जाते हैं.
केवल ५ ऐसे पुलिस अधिकारियों को भी जोड़ लिया जाए जो हर माह करीब २० लाख कमा लेते हैं.
आइये जोड़ें.
सफेदपोश                                               -१० करोड़
नेता                                                        -  ५ करोड़
व्यापारी                                                   -  १ करोड़
सरकारी कर्मचारी                                    -   १ करोड़
पुलिस                                                     -  १ करोड़
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कुल                                                           १८ करोड़
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ये तो मात्र एक मोटा मोटा हिसाब है और आप सभी जानते हैं कि खेल इससे बहुत ऊपर का होता है. चलिए इधर-उधर के २ करोड़ और जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं २० करोड़. भारत में इस समय ६८८ जिले हैं तो अगर  २० को ६८८ से गुणा की जाए तो बनता है १३७६० करोड़.
मतलब करीब १४ हजार करोड़ तो वो रकम है जो हर माह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है. वर्षभर में ये आँकड़ा करीब एक लाख करोड़ का बैठता है. इसमें किसी भी बड़े 'राष्ट्रीय' स्तर के घोटाले को नहीं जोड़ा गया है जहाँ ये 'आधे' घोटाले के बराबर की हो सकती है.
तो मेरा दिल तो यही कहता है कि भारत अब भी खासा पैसे वाला देश है. बस आवश्यकता है इसके सही जगह पर होने की. सही कोशिश की जाए तो ऐसा हो सकता है.
पर कोशिश करने वालों की अपनी तिजोरियां काले रंग में रंगी हुई हैं तो भला कौन प्रयत्न करेगा?



Wednesday, April 27, 2016

सावधान! आदमी काम पर हैं

आपने अपने शहर में कोई पुल  या  सड़क  बनती  देखी  है  कभी? आपने  नोटिस  किया  होगा  कि  इनके  शुरू होने  और बनने  में  कितना अधिक समय लग जाता है. आप उस  साइन बोर्ड  का  आकार प्रकार ,रंग रूप और हर कोना याद  कर  चुके होते हैं  जिस पर लिखा होता  है-
आदमी काम पर हैं. असुविधा के लिए खेद है.
अब ये असुविधा इतनी लंबी क्यों खींच गई? जब आदमी काम पर हैं तो भला काम खत्म होने पर क्यों नहीं आ रहा? आपको शायद  पता  ही  होगा कि  इस  बीच उस  पुल या  सड़क की लागत करीब दोगुनी हो  जाती है
और ये लागत हमारी और आपकी जेब से ही पूरी होती है.
दरअसल लेटलतीफी हमारी मानों रगों में बस गई है. सरकारी निर्माणों की बात तो छोड़ ही दीजिए, हमारे दैनिक जीवन में भी हम कभी दिल से ये कोशिश नहीं करते कि हम न केवल समय के साथ चलें बल्कि समय से एक हाथ आगे रहें. शादी या किसी समारोह में जाना है तो कार्ड में छपे समय से एक घंटा बाद ही पहुंचेंगे, कार्ड छपवाने वाला भी उसी हिसाब से समय डलवाता है. अगर ऑफिस में सख्ती नहीं है तो भले ही पाँच मिनट लेट हों, समय पर ऑफिस पहुँचने का सवाल ही नहीं बनता.
भारतीय रेलगाडियां भी इसका अपवाद नहीं हैं. २४ घंटे तक देर से चलने वाली गाड़ियां तो पहले ही लेट होने का रिकॉर्ड लेकर चलती हैं, ऊपर से जब देर से चलने वाली इन गाड़ियों में लोगों को चलती ट्रेन में भाग कर चढ़ते देखा जाता है तो लगता है कि ये लोग ट्रेन से क्या लेट होने की प्रतियोगिता कर रहे थे?
कोई स्कूल ऐसा शायद ही देखने को मिलेगा जहाँ तय समय के बाद भी १५-२० बच्चे गेट के बाहर लेट आने के बहाने लिए खड़े होंगे.
तो लेट होना हमारी  आदत नहीं हमारी 'लत' बन चुकी है. अच्छा है कि हम समय रहते इसे त्याग दें और अगर संभव हो तो सरकार की उस मशीनरी के खिलाफ भी आवाज उठायें जो हमारे देश के विकास को पीछे धक्का दे रही है. कोई पुल, कोई सड़क, कोई भवन या कोई भी योजना अपने समय पर पूरी होनी चाहिए वरना उसका खर्चा बढ़ जाता है और उसकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है.
पर जब तक हम जागते नहीं, आप अपने इस 'अधिकार' के सम्बन्ध में सोच पायेंगे क्या?



Tuesday, April 26, 2016

अतिथि दूरो भवः

शंघाई के हवाई अड्डे पर एक महीने में जितने लोग चढ़ते उतरते हैं उतने  भारत के सभी  हवाई  अड्डों पर वर्ष भर में भी यात्री नहीं होते. ये छोटा सा उदाहरण ये बताने के लिए काफी है कि विश्वभर में भारत आने वाले लोगों की संख्या कितनी है.
आपके ज्ञान के लिए बता दूँ कि विश्व में १९६ कुल देश हैं और विश्व के सात आश्चर्य में से एक 'ताजमहल' भारत में है. तो इस हिसाब से भारत २८ में से १ देश बैठता है जहाँ पर्यटक आने चाहियें. पर भारत आने वालों की संख्या देख कर बिलकुल भी नहीं लगता कि ताजमहल, लाल किला, खजुराहो, अजंता, एलीफैन्टा या कोई भी और भारतीय पर्यटक स्थल विश्व को इतना आकर्षित कर पाता है जबकि विश्व के कई देश तो केवल अपने पर्यटन प्रबंधन और प्रचार कौशल के कारण ही विश्व भर से पर्यटकों को वहाँ बुलाने और उनसे मुद्रा कमाने में अग्रणी हैं. जरा मलेशिया और ब्राजील को देखिये!
फिर हमारे यहाँ पर्यटक आये भी कैसे? अभी ऊपर जिस ताजमहल का मैंने जिक्र किया, उसका 'गृह नगर' यानि आगरा देखिएगा कभी जाकर. बेतरतीब रूप से विकसित, कूड़े के ढेर और गली मोहल्लों में उग रहे अनाप शनाप उद्योगों का शहर है आगरा. जरा सोचिये, जो शहर विश्व के सात आश्चर्यों में से एक को अपनी गोद में लिए हो, उसकी ऐसी हालत होनी चाहिए?
उसके बाद हमारा विदेशियों के प्रति व्यवहार. हम तो उन्हें ऐसे निहारते हैं मानो वो विदेश से नहीं, मंगल ग्रह से आये हों. कोशिश यही रहती है कि कदम कदम पर उन्हें जी भर कर लूट सकें. एक अजीब तरह से उनसे नजरें चिपका लेते हैं हम और मैंने देखा है कि वो ऐसे में बड़ा असहज महसूस करते हैं.
पर्यटन विभाग ने भी ऐसा कोई पुख्ता इंतजाम नहीं कर रखा कि भारत आने वाला पर्यटक रहने, घूमने, खाने पीने और खरीदारी करने में न तो असहज महसूस करे और न ही लुटा पिटा . शायद यही कारण है कि इतनी सारी पौराणिक विरासत होते हुए भी पर्यटकों के मामले में हम खाली हाथ ही हैं.
हमें अपने पर्यटन स्थल बेहतर बनाने होंगे, प्रबंधन को बेहतर करना होगा और सबसे बढ़कर, खुद को सुधारना होगा.
वरना 'अतिथि देवो भवः' के सूक्ति वाक्य पर चलने वाले इस भारत से देव दूर रहना ही पसंद करेंगे.



Monday, April 25, 2016

रंगभेद- शिकार भी हम, शिकारी भी हम

इस बारे में बात करने  से पहले मुझे अपने  बचपन का एक वाकया याद आता है. दिल्ली से मुंबई जाने वाली एक ट्रेन में सफर के दौरान हमारे डब्बे में कोई अफ़्रीकी सवार था. जब तक वो डब्बे में रहा, लोग उसकी खिल्ली उड़ाते रहे. वो हिंदी नहीं समझता था पर पर आज वो प्रताड़ना याद करके मेरी रूह काँप जाती है.
वो तो मेरा बचपन था पर आज बड़े होने के बाद मुझे पूरा विश्वास है कि हम भारतीय रंगभेद की मानसिकता में बुरी तरह जकड़े हुए हुए हैं. आज भी हमारी कहानियों में खलनायक 'काला और बेडौल' होता है और नायक 'गोरा और सुन्दर'.
ये 'गोरा' हमारे साथ हमारे दिलों से जुड़ा हुआ है. शादी करने वाले को 'गोरी कन्या' चाहिए, फिल्मों के पर्दों पर भी काले कलाकार या तो खलनायक होते हैं या फिर चल नहीं पाते. अभी कुछ दिनों पहले वेस्ट इंडीज की टीम ने टी-२० विश्व कप जीता था तो सोशल मीडिया पर उस टीम के  खिलाडियों के रूप रंग को लेकर जिस तरह से मजाक उड़ाई गई उससे स्पष्ट हो गया कि काले लोगों की योग्यता हमें बर्दाश्त नहीं.
यही नहीं, आप किसी गोरे विदेशी पर्यटक को देख लीजिए. हम उसकी ओर ऐसे निहारते हैं मानो कह रहे हों कि 'तुम वास्तव में महान हो. हम काले लोग तुम्हारे स्वागत के योग्य कहाँ? ये तो तुम्हारा अहसान है कि तुम हमारे देश में भ्रमण करने आये हो.' मतलब यहाँ पर हीनता की भावना प्रबल हो जाती है.
रंगभेद का सबसे बड़ा उदाहरण गोरेपन की क्रीम की बेतहाशा बिक्री है. पहले गोरा बनाने वाली क्रीम आई, फिर मर्दों को गोरा बनाने के लिए अलग से क्रीम पेश की गई और उसके बाद कई और क्रीम बाजार में आ गई हैं जो अपने काम करने के साथ साथ गोरा भी बनाती हैं. ये 'गोरा चिट्टा' शब्द भारतीय मानव के एक अतिरिक्त गुण को प्रदर्शित करता है जबकि 'काले' को काला कम और 'काला-कलूटा' ज्यादा संबोधित किया जाता है.
आप कितना ही इनकार कर लें, किसी श्याम वर्णीय स्त्री या पुरुष को देखते ही हमारे मन में संशय का सागर हिलोरे लेने लगता है. कारण! काला तो है ही, पता नहीं कितना सच्चा होगा? कहीं चोर न हो?
ऐसे विचार रह रह कर उमड़ने घुमड़ने लगते हैं. काली लड़कियां कितनी भी गुणवान क्यों न हों, विवाह के लिए बहुत प्रतीक्षा करती हैं जबकि गोरी लड़कियों के रिश्ते पहले ही आने लगते हैं.
समानता पर भाषण देने वालों को समाज के इस पक्ष के प्रति भी जागरूक होना पड़ेगा.

Saturday, April 23, 2016

कौन खेलना चाहेगा भला

अभी पिछले एक पोस्ट में मैंने क्रिकेट के प्रति भारतीयों की दीवानगी और इससे होने वाले नुकसान की बात की थी.
आज एक रिपोर्ट में देखा कि गुजरात में एक राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज नूडल्स बेच कर अपनी आजीविका चला रही है. क्यों? क्योंकि उसके पास राइफल खरीदने के पैसे नहीं हैं. आज से करीब तीन वर्ष पहले एक पत्रिका में पढ़ी रिपोर्ट में मैंने भारतीय खिलाड़ियों को चाट, सब्जी बेचते यहाँ तक कि मजदूरी करते भी देखा. यहाँ तक कि ओलम्पिक में मेडल जीत कर आये पहलवान को अपने ही स्वागत समारोह में एक 'ऑटो' से जाना पड़ा था.
ऐसे में कौन से माता पिता अपने बच्चों को खेल के प्रति आकर्षित करना चाहेंगे?
खेलों की हालत बुरी है और बहुत बुरी है, इसे जानने के लिए कोई बहुत बड़ा खेल विशेषज्ञ होने की कोई आवश्यकता नहीं. आप अपने स्थानीय स्तर पर ही किसी खिलाड़ी से पूछ लें तो आपको समझ में आ जाएगा कि क्या चल रहा है. जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों से रिश्वत मांगी जाती है, सिफारिशों पर अयोग्य खिलाड़ी भर्ती कर लिए जाते हैं और अगर कोई इन चुनौतियों से जूझ कर वहाँ पहुँच भी जाए और जीत भी जाए तो उसकी कोई कद्र नहीं होती.
कुछ जगह खेलों में अच्छे मेडल पाना सरकारी नौकरी पाने का शॉर्टकट होता है. ये स्थिति भी ठीक नहीं. खिलाड़ी को वैसे ही इतनी सुविधाएँ मिल जानी चाहियें कि वो बस अपने खेल के बारे में सोचे और देश के लिए अधिकाधिक पदक जीत सके. हम भारत के गाँवों की ओर रूख कर सकते हैं जहाँ हमें विश्व के बेहतरीन एथलीट मिल सकते हैं. लंबी कूद, ऊँची कूद, दौड़, गोला फेंक इत्यादि तो ये खेल खेल में ही बहुत अच्छी कर लेते हैं. अगर इन्हें सँवारने को सही मार्गदर्शक मिल जाए तो इन्हें कौन रोक सकता है?
पर मार्गदर्शक तो कोई और मार्ग पर चल रहा होता है. ऊपर से निकम्मी सरकारी मशीनरी और अंत में वो धनवान कंपनियां जो इन खिलाड़ियों पर किसी हालत में एक रुपया नहीं लगाना चाहतीं.
नहीं तो किसकी औकात है कि सवा करोड़ की जनसँख्या वाले इस देश से पंगा ले ले.



Friday, April 22, 2016

सुधरेंगे पर खौफ से

हम दीवारों पर लघुशंका करते दिखाई पड़ जाते हैं.
लड़कियों को अश्लीलता की हद तक घूरते,
कहीं भी गंदगी कूड़ा  फेंकते...
कहीं भी थूकते...
गाली बकते..
सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करते...
ट्रैफिक नियमों की धज्जियाँ उड़ाते...
रेलवे बैरियर उठा कर मोटरसाइकल निकालते..




सड़क घेर कर समारोह करते...
कतार में आगे जाने को झगड़ते...
लिस्ट अभी बहुत लंबी है पर सवाल ये है कि हम भारतीय कोई काम कायदे से तभी क्यों करते हैं जब हमारे ऊपर क़ानून या कोई और खौफ या 'डंडा' न हो? क्या हम भारतीयों की तरह भारत के बारे में नहीं सोच सकते? कोई देख रहा है या नहीं देख रहा है, हमें सजा हो जायेगी या अपमान हो सकता है, क्या बस यही ख्याल हमें कुछ ऐसा करने से रोक सकते हैं जो वास्तव में हमारे भारत की छवि को धूमिल करते हों? ये सब तो ऐसे कार्य हैं जिनके लिए आपको कोई बहुत बड़ा देशप्रेमी होने की आवश्यकता भी नहीं. कूड़ा कूड़ेदान में डालने में क्या परेशानी है या फिर सरे आम सड़कों पर गाली गलौज से कौन सी आपकी प्रतिष्ठा बढ़ती है?
देश के लिए कुछ करने के लिए हर बार सेना में शामिल होना या सीमा पर गोली खाकर शहीद होना ही जरुरी नहीं है. आप देश में रहकर ही बहुत कुछ कर सकते हैं. या यूँ कहिये कि कुछ ऐसा नहीं कर सकते जो आपके देश और समाज के लिए अच्छा न हो. साथ ही आप औरों को भी ऐसा कुछ करने या 'न करने' के लिए प्रेरित कर सकते हैं वो भी महज नम्रता से निवेदन करके. चूँकि बात हमारे देश की है तो छोटे छोटे प्रयास ही एक बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं.
शुरुआत तो कीजिये!

Thursday, April 21, 2016

हर कदम पर कटोरा

भारत में अगर स्वरोजगार पर किताब लिखी जाए तो 'भिक्षा' उसमे प्रमुख रूप से वर्णित होनी चाहिए. आप कहीं भी चले जाइए, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मॉल, सड़क,चौराहे, मेला, पार्क, दुकान, मंदिर, मस्जिद, चर्च या फिर कोई भी सार्वजनिक स्थान, आपको एक न एक भिखारी मिल ही जाएगा. अगर इन सबसे बच कर आप घर पर बैठ जाएँ तो आपके दरवाजे पर ही आकर खड़ा हो जाएगा.
भीख माँगना किसी की मजबूरी हो सकती है पर भारत में तो ये सुसंगठित व्यापार बन गया है. पूरी तरह से समर्थ स्त्री, पुरुष इसे अपना रहे हैं. इसे चलाने वाले गिरोह बन गए हैं जो लोगों को अपंग  बना  कर उनसे भीख मंगवा रहे हैं . जिस उम्र में बच्चे खेल खिलौनों से खेलते हैं, उस उम्र में उनसे भीख मंगवाई जा रही है. अगर आप ट्रेन से २००  किलोमीटर का  सफर  तय करें तो आपको इस बीच कम से कम दस भिखारी तो मिल ही जायेंगे. मतलब हर २० किलोमीटर पर एक भिखारी. 
इसके पीछे हम भारतीयों की 'परोपकार' की भावना भी जिम्मेदार है. हम एक बार भी नहीं सोचते कि किसी शारीरिक रूप से समर्थ व्यक्ति को भीख देना तो उसका अपमान ही है जो कार्य करके स्वाभिमान से रोजी रोटी कमाना चाहता है. वास्तव में ये इतने बेचारे भी नहीं होते. आपसे मिलने वाली छोटी सी रकम को जोड़ा जाए तो इनका 'औसत' एक अच्छी खासी कमाई वाले से ऊपर बैठता है. आप इनसे काम करने को कहेंगे तो ये मुहँ बितरा देते हैं.
भिखारियों के गिरोह लाखों के वारे न्यारे कर रहे हैं. कुछ भिखारियों के बिस्तर में लाखों रूपये पाए गए हैं और कई भिखारियों का बैंक बैलेंस भी तगड़ा है. ऐसे में इनको भीख देना न तो हमारे लिए उचित है और न हमारे देश के लिए.
समाज सहयोग से चलता है. हमें समाज के गरीब और लाचार तबके को ऊपर उठाने में सहयोग जरूर करना चाहिए लेकिन कहीं ये सहयोग उन्हें किसी गलत दिशा में तो नहीं ले जा रहा या स्वाभिमानी लोगों को चोट तो नहीं पहुंचा रहा, ये देखना भी हमारी जिम्मेदारी है.
दान करना है तो जरूर करें, पर आपका ये दान सही व्यक्ति की सही मदद कर रहा है या नहीं, ये भी देखें.
वरना विश्व के नक़्शे में भारत को 'भिखारियों का देश' बनते देर नहीं लगेगी.




Wednesday, April 20, 2016

आस्थाओं के अँधेरे में गुम भविष्य

अगर आंकड़ों को देखा जाए तो भारत के हर ५०० लोगों पर एक धार्मिक स्थल है. भारत के  धार्मिक स्थलों पर चढाया जाने वाला कुल धन और अर्थ भारत के एक बड़े हिस्से की निर्धनता दूर कर सकता है और ....
भारत के लोग विश्व इंडेक्स में ८३% धार्मिक हैं.
इसका अर्थ समझते हैं आप? इसका अर्थ ये हुआ कि अपने जीवन का या किसी एक खास दिन का ८३% हिस्सा हम धर्म या धार्मिक सोचने या करने में बिता देते हैं. समय और धन की बर्बादी का इससे खराब उदाहरण मुश्किल से ही मिलेगा. एक तथ्य और है- दोनों विश्वयुद्धों में मारे गए लोगों की संख्या अब तक धर्म या धार्मिक उन्माद या दंगों में मारे गए लोगों के लगभग बराबर हैं. तो इसका अर्थ ये हुआ कि पूरी दुनिया की लड़ाई एक तरफ और भारत की धार्मिकता एक तरफ.
यहाँ किसी खास धर्म की बात करना अर्थहीन होगा. किसी विशेष क्षेत्र, व्यक्ति या समाज की बात नहीं, बात वही है जो पहले भी हमेशा मैंने की है- बात भारत की है. पैसा हम धार्मिक स्थलों पर खर्च कर देंगे, समय हम धर्म की सोचने में बिता देंगे और मानवता धर्म के नाम पर दंगों की भेंट चढ़ा देंगे तो फिर ये धर्म कहाँ हुआ, अधर्म ही हुआ न!
वैसे तो धर्म को नितांत व्यक्तिगत माना जाता है पर सड़क घेर कर धार्मिक अनुष्ठान करना, लाउडस्पीकर लगा कर लोगों को रात भर जगाना और जुलुस के नाम पर शहर को रोक देना कौन सा उचित है?
कहीं कब्ज़ा करना है तो वहाँ एक धार्मिक स्थल बना दो, ये नीति है कई भारतीयों की.
और अंत में इसका लाभ होता है धार्मिक गुरुओं को. धार्मिक स्थल इनकी दुकान बन जाते हैं और धार्मिक लोग इनके 'शिकार'.इनको ठगना और इनका शोषण करना इनका धर्म. हालत ये है कि पकड़े जाने और जेल पहुँचने के बाद भी इनसे लोगों का मोहभंग नहीं होता. धार्मिक स्थलों पर कब्जों के लिए हत्याएं भी होती रहती हैं और बहुत से धार्मिक गुरु जो हमें मोहमाया से दूर और निर्भीक रहने का पाठ पढ़ाते रहते हैं, स्वयं सुरक्षा घेरे में कारों और हवाई जहाजों में घूमते रहते हैं.
धार्मिक होना कुछ गलत नहीं, अपने विश्वास और श्रद्धा को अपनी दुर्बलता न बनने दें. ईश्वर को किसी भी रूप में मानते हों, उसके नाम पर उसके किसी 'दलाल' को स्थान न दें. अपनी आँखें और मस्तिष्क को खुला रखें.
मुझे पता है कि ये विषय संवेदनशील है पर अपनी संवेदनाए भारत के सन्दर्भ से भी जोड़ें.
और आप पायेंगे कि जब भारत शक्तिशाली होता है तो आपको भी उत्थान का पूर्ण अवसर प्राप्त होता है.