Friday, April 29, 2016

जाग जाग कर सोता भारत

भारत के बहुत से राज्यों में इस समय सूखा पड़ रहा है. कई जगह लोगों को पानी के लिए मीलों चल कर जाना पड़ रहा है तो कई जगह पेट्रोल के भाव पर पानी खरीदना पड़ रहा है. ऐसे में इन राज्यों की सरकार अपने राज्यवासियों के बीच जनजागरूकता अभियान छेड़े हुए हैं जिसके द्वारा लोगों को पानी की बर्बादी रोकने, अधिकाधिक पानी बचाने और सार्वजानिक जल भंडारों की रक्षा करने का सन्देश दिया जा रहा है.
ऐसे कई जागरूकता अभियान मैंने अपने जीवन में देखे हैं. उनमे से कई तो ऐसे ही चलते हैं जैसे ऊपर दिया गया उदाहरण यानि जब आग लगे तब कुआँ खोदो. सत्य तो ये है कि अगर ये उपाय पहले ही अपना लिए गए होते तो शायद आज इस अभियान की आवश्यकता ही नहीं होती.
इसी तरह वृक्ष लगाओ अभियान, सफाई अभियान, ट्रैफिक जागरण, स्त्री सम्मान सप्ताह और पता नहीं कितने जागरूकता अभियान चलाये जाते हैं. मेरा ये कहना नहीं कि ये अभियान सफल नहीं होते या इनका कोई भी महत्व नहीं है किन्तु अधिकांशतः अभियान जागरूकता अभियान की जगह 'जाग कर रुक गए' अभियान बन कर रह जाते हैं. इसीका परिणाम है कि अभी तक हमने महिलाओं का सम्मान करना नहीं सीखा, सड़क पर चलने की तमीज नहीं सीखी और पेड़ों के महत्व को भी हम तभी समझ पाते हैं जब हमें अपना वहाँ उनकी छाया के नीचे खड़ा करना होता है. कुछ उदाहरण तो ऐसे हैं जहाँ जनता ने किये कराये को बदतर हालत में पहुंचा दिया जैसे पेड़ लगवा दिये गए पर उनका किसी ने ध्यान नहीं रखा. शौचालय बने रहे और लोग खेतों में शौच करते रहे. ट्रैफिक लाईट की ओर आँख उठा कर भी नहीं देखा और अपनी राह चलते रहे.
कहा गया है-'जब जागो, तब सवेरा'. बिलकुल ठीक बात है पर इस हिसाब से जब सो जाओ तब रात भी तो है. इसलिए, जागे ही हैं तो जागे रहिये. हर अभियान के बात हम और आप यूँ ही उसकी उपेक्षा कर देंगे तो भारत आगे कैसे बढ़ेगा? मैंने पहले भी जिक्र किया है कि ये सब तो भारत को बेहतर बनाने के लिए हमारे जीवन का हिस्सा होना चाहिए और इनमे से कई के लिए तो अभियान चलाने जैसा कुछ होना भी नहीं चाहिए. ये भावना तो हमारे ह्रदय में पहले से वास करनी चाहिए.
लगता है इन अभियानों की सफलता सुनिश्चित करने के लिए भी एक 'महा जागरूकता अभियान' चलाना पड़ेगा.



Thursday, April 28, 2016

बाहर आने को तरसती चिड़िया

कहा जाता है कि भारत कभी सोने की चिड़िया था लेकिन विदेशी आक्रमणकारी हमारा धन और ऐश्वर्य लूट कर ले गए. अब तो दुनिया के गरीबों और भुखमरों का एक बड़ा प्रतिशत भारत में रहता है.
अभी  बैठे बैठे पेपर पढ़ते हुए  एक खबर देखी कि एक साधारण से सरकारी  चपरासी  के घर में छापा पड़ा तो उसके पास ३६ करोड़ की संपत्ति पकड़ी गई. फिर एक सरकारी इंजिनियर के घर छापे  की खबर देखी. उसके
पास करीब १००० करोड़ की संपत्ति का अनुमान है .
 मेरा माथा ठनका. केवल दो लोगों के पास ही इतनी संपत्ति है तो भारत में तो ऐसे भ्रष्टाचारियों की  भरमार है. जाने अनजाने मन में ये हिसाब आने लगा कि अगर इन सबकी कुल संपत्ति मिला दी जाए तो कितनी होगी.
आइये आप भी मेरा ये हिसाब देखिये. शुरुआत एक जिले में इस प्रकार आमदनी करने वाले भ्रष्ट लोगों से करते हैं.
सबसे पहले सफेदपोश यानि समाज में रसूख बना कर रहने वाले और सभी तरह के अवैध धंधों में लिप्त लोगों से. इनके पुलिस और राजनीतिज्ञों दोनों से अच्छे सम्बन्ध होते हैं और इन्ही के बल पर ये रोज और अमीर होते जाते हैं.
तो मान लीजिए आपके जिले में ऐसे केवल दस लोग हैं जो प्रति माह १ करोड़ की अवैध आमदनी करते हैं.
पाँच ऐसे नेता हैं जो हर महीने १ करोड़ आराम से डकार जाते हैं.
टैक्स में खेल करके काले को सफ़ेद बनाने वाले कम से कम १० ऐसे व्यापारी भी हैं जिसमे से प्रत्येक प्रतिमाह १० लाख का तो खेल कर ही लेता है.
कम से कम १०० ऐसे सरकारी कर्मचारी जो ऐसे पदों पर बैठे हैं जहाँ से वो 'काम बनवाने', भुगतान देने, ठेका दिलवाने आदि के नाम पर प्रतिमाह १ लाख कमा जाते हैं.
केवल ५ ऐसे पुलिस अधिकारियों को भी जोड़ लिया जाए जो हर माह करीब २० लाख कमा लेते हैं.
आइये जोड़ें.
सफेदपोश                                               -१० करोड़
नेता                                                        -  ५ करोड़
व्यापारी                                                   -  १ करोड़
सरकारी कर्मचारी                                    -   १ करोड़
पुलिस                                                     -  १ करोड़
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कुल                                                           १८ करोड़
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ये तो मात्र एक मोटा मोटा हिसाब है और आप सभी जानते हैं कि खेल इससे बहुत ऊपर का होता है. चलिए इधर-उधर के २ करोड़ और जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं २० करोड़. भारत में इस समय ६८८ जिले हैं तो अगर  २० को ६८८ से गुणा की जाए तो बनता है १३७६० करोड़.
मतलब करीब १४ हजार करोड़ तो वो रकम है जो हर माह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है. वर्षभर में ये आँकड़ा करीब एक लाख करोड़ का बैठता है. इसमें किसी भी बड़े 'राष्ट्रीय' स्तर के घोटाले को नहीं जोड़ा गया है जहाँ ये 'आधे' घोटाले के बराबर की हो सकती है.
तो मेरा दिल तो यही कहता है कि भारत अब भी खासा पैसे वाला देश है. बस आवश्यकता है इसके सही जगह पर होने की. सही कोशिश की जाए तो ऐसा हो सकता है.
पर कोशिश करने वालों की अपनी तिजोरियां काले रंग में रंगी हुई हैं तो भला कौन प्रयत्न करेगा?



Wednesday, April 27, 2016

सावधान! आदमी काम पर हैं

आपने अपने शहर में कोई पुल  या  सड़क  बनती  देखी  है  कभी? आपने  नोटिस  किया  होगा  कि  इनके  शुरू होने  और बनने  में  कितना अधिक समय लग जाता है. आप उस  साइन बोर्ड  का  आकार प्रकार ,रंग रूप और हर कोना याद  कर  चुके होते हैं  जिस पर लिखा होता  है-
आदमी काम पर हैं. असुविधा के लिए खेद है.
अब ये असुविधा इतनी लंबी क्यों खींच गई? जब आदमी काम पर हैं तो भला काम खत्म होने पर क्यों नहीं आ रहा? आपको शायद  पता  ही  होगा कि  इस  बीच उस  पुल या  सड़क की लागत करीब दोगुनी हो  जाती है
और ये लागत हमारी और आपकी जेब से ही पूरी होती है.
दरअसल लेटलतीफी हमारी मानों रगों में बस गई है. सरकारी निर्माणों की बात तो छोड़ ही दीजिए, हमारे दैनिक जीवन में भी हम कभी दिल से ये कोशिश नहीं करते कि हम न केवल समय के साथ चलें बल्कि समय से एक हाथ आगे रहें. शादी या किसी समारोह में जाना है तो कार्ड में छपे समय से एक घंटा बाद ही पहुंचेंगे, कार्ड छपवाने वाला भी उसी हिसाब से समय डलवाता है. अगर ऑफिस में सख्ती नहीं है तो भले ही पाँच मिनट लेट हों, समय पर ऑफिस पहुँचने का सवाल ही नहीं बनता.
भारतीय रेलगाडियां भी इसका अपवाद नहीं हैं. २४ घंटे तक देर से चलने वाली गाड़ियां तो पहले ही लेट होने का रिकॉर्ड लेकर चलती हैं, ऊपर से जब देर से चलने वाली इन गाड़ियों में लोगों को चलती ट्रेन में भाग कर चढ़ते देखा जाता है तो लगता है कि ये लोग ट्रेन से क्या लेट होने की प्रतियोगिता कर रहे थे?
कोई स्कूल ऐसा शायद ही देखने को मिलेगा जहाँ तय समय के बाद भी १५-२० बच्चे गेट के बाहर लेट आने के बहाने लिए खड़े होंगे.
तो लेट होना हमारी  आदत नहीं हमारी 'लत' बन चुकी है. अच्छा है कि हम समय रहते इसे त्याग दें और अगर संभव हो तो सरकार की उस मशीनरी के खिलाफ भी आवाज उठायें जो हमारे देश के विकास को पीछे धक्का दे रही है. कोई पुल, कोई सड़क, कोई भवन या कोई भी योजना अपने समय पर पूरी होनी चाहिए वरना उसका खर्चा बढ़ जाता है और उसकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है.
पर जब तक हम जागते नहीं, आप अपने इस 'अधिकार' के सम्बन्ध में सोच पायेंगे क्या?



Tuesday, April 26, 2016

अतिथि दूरो भवः

शंघाई के हवाई अड्डे पर एक महीने में जितने लोग चढ़ते उतरते हैं उतने  भारत के सभी  हवाई  अड्डों पर वर्ष भर में भी यात्री नहीं होते. ये छोटा सा उदाहरण ये बताने के लिए काफी है कि विश्वभर में भारत आने वाले लोगों की संख्या कितनी है.
आपके ज्ञान के लिए बता दूँ कि विश्व में १९६ कुल देश हैं और विश्व के सात आश्चर्य में से एक 'ताजमहल' भारत में है. तो इस हिसाब से भारत २८ में से १ देश बैठता है जहाँ पर्यटक आने चाहियें. पर भारत आने वालों की संख्या देख कर बिलकुल भी नहीं लगता कि ताजमहल, लाल किला, खजुराहो, अजंता, एलीफैन्टा या कोई भी और भारतीय पर्यटक स्थल विश्व को इतना आकर्षित कर पाता है जबकि विश्व के कई देश तो केवल अपने पर्यटन प्रबंधन और प्रचार कौशल के कारण ही विश्व भर से पर्यटकों को वहाँ बुलाने और उनसे मुद्रा कमाने में अग्रणी हैं. जरा मलेशिया और ब्राजील को देखिये!
फिर हमारे यहाँ पर्यटक आये भी कैसे? अभी ऊपर जिस ताजमहल का मैंने जिक्र किया, उसका 'गृह नगर' यानि आगरा देखिएगा कभी जाकर. बेतरतीब रूप से विकसित, कूड़े के ढेर और गली मोहल्लों में उग रहे अनाप शनाप उद्योगों का शहर है आगरा. जरा सोचिये, जो शहर विश्व के सात आश्चर्यों में से एक को अपनी गोद में लिए हो, उसकी ऐसी हालत होनी चाहिए?
उसके बाद हमारा विदेशियों के प्रति व्यवहार. हम तो उन्हें ऐसे निहारते हैं मानो वो विदेश से नहीं, मंगल ग्रह से आये हों. कोशिश यही रहती है कि कदम कदम पर उन्हें जी भर कर लूट सकें. एक अजीब तरह से उनसे नजरें चिपका लेते हैं हम और मैंने देखा है कि वो ऐसे में बड़ा असहज महसूस करते हैं.
पर्यटन विभाग ने भी ऐसा कोई पुख्ता इंतजाम नहीं कर रखा कि भारत आने वाला पर्यटक रहने, घूमने, खाने पीने और खरीदारी करने में न तो असहज महसूस करे और न ही लुटा पिटा . शायद यही कारण है कि इतनी सारी पौराणिक विरासत होते हुए भी पर्यटकों के मामले में हम खाली हाथ ही हैं.
हमें अपने पर्यटन स्थल बेहतर बनाने होंगे, प्रबंधन को बेहतर करना होगा और सबसे बढ़कर, खुद को सुधारना होगा.
वरना 'अतिथि देवो भवः' के सूक्ति वाक्य पर चलने वाले इस भारत से देव दूर रहना ही पसंद करेंगे.



Monday, April 25, 2016

रंगभेद- शिकार भी हम, शिकारी भी हम

इस बारे में बात करने  से पहले मुझे अपने  बचपन का एक वाकया याद आता है. दिल्ली से मुंबई जाने वाली एक ट्रेन में सफर के दौरान हमारे डब्बे में कोई अफ़्रीकी सवार था. जब तक वो डब्बे में रहा, लोग उसकी खिल्ली उड़ाते रहे. वो हिंदी नहीं समझता था पर पर आज वो प्रताड़ना याद करके मेरी रूह काँप जाती है.
वो तो मेरा बचपन था पर आज बड़े होने के बाद मुझे पूरा विश्वास है कि हम भारतीय रंगभेद की मानसिकता में बुरी तरह जकड़े हुए हुए हैं. आज भी हमारी कहानियों में खलनायक 'काला और बेडौल' होता है और नायक 'गोरा और सुन्दर'.
ये 'गोरा' हमारे साथ हमारे दिलों से जुड़ा हुआ है. शादी करने वाले को 'गोरी कन्या' चाहिए, फिल्मों के पर्दों पर भी काले कलाकार या तो खलनायक होते हैं या फिर चल नहीं पाते. अभी कुछ दिनों पहले वेस्ट इंडीज की टीम ने टी-२० विश्व कप जीता था तो सोशल मीडिया पर उस टीम के  खिलाडियों के रूप रंग को लेकर जिस तरह से मजाक उड़ाई गई उससे स्पष्ट हो गया कि काले लोगों की योग्यता हमें बर्दाश्त नहीं.
यही नहीं, आप किसी गोरे विदेशी पर्यटक को देख लीजिए. हम उसकी ओर ऐसे निहारते हैं मानो कह रहे हों कि 'तुम वास्तव में महान हो. हम काले लोग तुम्हारे स्वागत के योग्य कहाँ? ये तो तुम्हारा अहसान है कि तुम हमारे देश में भ्रमण करने आये हो.' मतलब यहाँ पर हीनता की भावना प्रबल हो जाती है.
रंगभेद का सबसे बड़ा उदाहरण गोरेपन की क्रीम की बेतहाशा बिक्री है. पहले गोरा बनाने वाली क्रीम आई, फिर मर्दों को गोरा बनाने के लिए अलग से क्रीम पेश की गई और उसके बाद कई और क्रीम बाजार में आ गई हैं जो अपने काम करने के साथ साथ गोरा भी बनाती हैं. ये 'गोरा चिट्टा' शब्द भारतीय मानव के एक अतिरिक्त गुण को प्रदर्शित करता है जबकि 'काले' को काला कम और 'काला-कलूटा' ज्यादा संबोधित किया जाता है.
आप कितना ही इनकार कर लें, किसी श्याम वर्णीय स्त्री या पुरुष को देखते ही हमारे मन में संशय का सागर हिलोरे लेने लगता है. कारण! काला तो है ही, पता नहीं कितना सच्चा होगा? कहीं चोर न हो?
ऐसे विचार रह रह कर उमड़ने घुमड़ने लगते हैं. काली लड़कियां कितनी भी गुणवान क्यों न हों, विवाह के लिए बहुत प्रतीक्षा करती हैं जबकि गोरी लड़कियों के रिश्ते पहले ही आने लगते हैं.
समानता पर भाषण देने वालों को समाज के इस पक्ष के प्रति भी जागरूक होना पड़ेगा.

Saturday, April 23, 2016

कौन खेलना चाहेगा भला

अभी पिछले एक पोस्ट में मैंने क्रिकेट के प्रति भारतीयों की दीवानगी और इससे होने वाले नुकसान की बात की थी.
आज एक रिपोर्ट में देखा कि गुजरात में एक राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज नूडल्स बेच कर अपनी आजीविका चला रही है. क्यों? क्योंकि उसके पास राइफल खरीदने के पैसे नहीं हैं. आज से करीब तीन वर्ष पहले एक पत्रिका में पढ़ी रिपोर्ट में मैंने भारतीय खिलाड़ियों को चाट, सब्जी बेचते यहाँ तक कि मजदूरी करते भी देखा. यहाँ तक कि ओलम्पिक में मेडल जीत कर आये पहलवान को अपने ही स्वागत समारोह में एक 'ऑटो' से जाना पड़ा था.
ऐसे में कौन से माता पिता अपने बच्चों को खेल के प्रति आकर्षित करना चाहेंगे?
खेलों की हालत बुरी है और बहुत बुरी है, इसे जानने के लिए कोई बहुत बड़ा खेल विशेषज्ञ होने की कोई आवश्यकता नहीं. आप अपने स्थानीय स्तर पर ही किसी खिलाड़ी से पूछ लें तो आपको समझ में आ जाएगा कि क्या चल रहा है. जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों से रिश्वत मांगी जाती है, सिफारिशों पर अयोग्य खिलाड़ी भर्ती कर लिए जाते हैं और अगर कोई इन चुनौतियों से जूझ कर वहाँ पहुँच भी जाए और जीत भी जाए तो उसकी कोई कद्र नहीं होती.
कुछ जगह खेलों में अच्छे मेडल पाना सरकारी नौकरी पाने का शॉर्टकट होता है. ये स्थिति भी ठीक नहीं. खिलाड़ी को वैसे ही इतनी सुविधाएँ मिल जानी चाहियें कि वो बस अपने खेल के बारे में सोचे और देश के लिए अधिकाधिक पदक जीत सके. हम भारत के गाँवों की ओर रूख कर सकते हैं जहाँ हमें विश्व के बेहतरीन एथलीट मिल सकते हैं. लंबी कूद, ऊँची कूद, दौड़, गोला फेंक इत्यादि तो ये खेल खेल में ही बहुत अच्छी कर लेते हैं. अगर इन्हें सँवारने को सही मार्गदर्शक मिल जाए तो इन्हें कौन रोक सकता है?
पर मार्गदर्शक तो कोई और मार्ग पर चल रहा होता है. ऊपर से निकम्मी सरकारी मशीनरी और अंत में वो धनवान कंपनियां जो इन खिलाड़ियों पर किसी हालत में एक रुपया नहीं लगाना चाहतीं.
नहीं तो किसकी औकात है कि सवा करोड़ की जनसँख्या वाले इस देश से पंगा ले ले.



Friday, April 22, 2016

सुधरेंगे पर खौफ से

हम दीवारों पर लघुशंका करते दिखाई पड़ जाते हैं.
लड़कियों को अश्लीलता की हद तक घूरते,
कहीं भी गंदगी कूड़ा  फेंकते...
कहीं भी थूकते...
गाली बकते..
सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करते...
ट्रैफिक नियमों की धज्जियाँ उड़ाते...
रेलवे बैरियर उठा कर मोटरसाइकल निकालते..




सड़क घेर कर समारोह करते...
कतार में आगे जाने को झगड़ते...
लिस्ट अभी बहुत लंबी है पर सवाल ये है कि हम भारतीय कोई काम कायदे से तभी क्यों करते हैं जब हमारे ऊपर क़ानून या कोई और खौफ या 'डंडा' न हो? क्या हम भारतीयों की तरह भारत के बारे में नहीं सोच सकते? कोई देख रहा है या नहीं देख रहा है, हमें सजा हो जायेगी या अपमान हो सकता है, क्या बस यही ख्याल हमें कुछ ऐसा करने से रोक सकते हैं जो वास्तव में हमारे भारत की छवि को धूमिल करते हों? ये सब तो ऐसे कार्य हैं जिनके लिए आपको कोई बहुत बड़ा देशप्रेमी होने की आवश्यकता भी नहीं. कूड़ा कूड़ेदान में डालने में क्या परेशानी है या फिर सरे आम सड़कों पर गाली गलौज से कौन सी आपकी प्रतिष्ठा बढ़ती है?
देश के लिए कुछ करने के लिए हर बार सेना में शामिल होना या सीमा पर गोली खाकर शहीद होना ही जरुरी नहीं है. आप देश में रहकर ही बहुत कुछ कर सकते हैं. या यूँ कहिये कि कुछ ऐसा नहीं कर सकते जो आपके देश और समाज के लिए अच्छा न हो. साथ ही आप औरों को भी ऐसा कुछ करने या 'न करने' के लिए प्रेरित कर सकते हैं वो भी महज नम्रता से निवेदन करके. चूँकि बात हमारे देश की है तो छोटे छोटे प्रयास ही एक बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं.
शुरुआत तो कीजिये!

Thursday, April 21, 2016

हर कदम पर कटोरा

भारत में अगर स्वरोजगार पर किताब लिखी जाए तो 'भिक्षा' उसमे प्रमुख रूप से वर्णित होनी चाहिए. आप कहीं भी चले जाइए, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मॉल, सड़क,चौराहे, मेला, पार्क, दुकान, मंदिर, मस्जिद, चर्च या फिर कोई भी सार्वजनिक स्थान, आपको एक न एक भिखारी मिल ही जाएगा. अगर इन सबसे बच कर आप घर पर बैठ जाएँ तो आपके दरवाजे पर ही आकर खड़ा हो जाएगा.
भीख माँगना किसी की मजबूरी हो सकती है पर भारत में तो ये सुसंगठित व्यापार बन गया है. पूरी तरह से समर्थ स्त्री, पुरुष इसे अपना रहे हैं. इसे चलाने वाले गिरोह बन गए हैं जो लोगों को अपंग  बना  कर उनसे भीख मंगवा रहे हैं . जिस उम्र में बच्चे खेल खिलौनों से खेलते हैं, उस उम्र में उनसे भीख मंगवाई जा रही है. अगर आप ट्रेन से २००  किलोमीटर का  सफर  तय करें तो आपको इस बीच कम से कम दस भिखारी तो मिल ही जायेंगे. मतलब हर २० किलोमीटर पर एक भिखारी. 
इसके पीछे हम भारतीयों की 'परोपकार' की भावना भी जिम्मेदार है. हम एक बार भी नहीं सोचते कि किसी शारीरिक रूप से समर्थ व्यक्ति को भीख देना तो उसका अपमान ही है जो कार्य करके स्वाभिमान से रोजी रोटी कमाना चाहता है. वास्तव में ये इतने बेचारे भी नहीं होते. आपसे मिलने वाली छोटी सी रकम को जोड़ा जाए तो इनका 'औसत' एक अच्छी खासी कमाई वाले से ऊपर बैठता है. आप इनसे काम करने को कहेंगे तो ये मुहँ बितरा देते हैं.
भिखारियों के गिरोह लाखों के वारे न्यारे कर रहे हैं. कुछ भिखारियों के बिस्तर में लाखों रूपये पाए गए हैं और कई भिखारियों का बैंक बैलेंस भी तगड़ा है. ऐसे में इनको भीख देना न तो हमारे लिए उचित है और न हमारे देश के लिए.
समाज सहयोग से चलता है. हमें समाज के गरीब और लाचार तबके को ऊपर उठाने में सहयोग जरूर करना चाहिए लेकिन कहीं ये सहयोग उन्हें किसी गलत दिशा में तो नहीं ले जा रहा या स्वाभिमानी लोगों को चोट तो नहीं पहुंचा रहा, ये देखना भी हमारी जिम्मेदारी है.
दान करना है तो जरूर करें, पर आपका ये दान सही व्यक्ति की सही मदद कर रहा है या नहीं, ये भी देखें.
वरना विश्व के नक़्शे में भारत को 'भिखारियों का देश' बनते देर नहीं लगेगी.




Wednesday, April 20, 2016

आस्थाओं के अँधेरे में गुम भविष्य

अगर आंकड़ों को देखा जाए तो भारत के हर ५०० लोगों पर एक धार्मिक स्थल है. भारत के  धार्मिक स्थलों पर चढाया जाने वाला कुल धन और अर्थ भारत के एक बड़े हिस्से की निर्धनता दूर कर सकता है और ....
भारत के लोग विश्व इंडेक्स में ८३% धार्मिक हैं.
इसका अर्थ समझते हैं आप? इसका अर्थ ये हुआ कि अपने जीवन का या किसी एक खास दिन का ८३% हिस्सा हम धर्म या धार्मिक सोचने या करने में बिता देते हैं. समय और धन की बर्बादी का इससे खराब उदाहरण मुश्किल से ही मिलेगा. एक तथ्य और है- दोनों विश्वयुद्धों में मारे गए लोगों की संख्या अब तक धर्म या धार्मिक उन्माद या दंगों में मारे गए लोगों के लगभग बराबर हैं. तो इसका अर्थ ये हुआ कि पूरी दुनिया की लड़ाई एक तरफ और भारत की धार्मिकता एक तरफ.
यहाँ किसी खास धर्म की बात करना अर्थहीन होगा. किसी विशेष क्षेत्र, व्यक्ति या समाज की बात नहीं, बात वही है जो पहले भी हमेशा मैंने की है- बात भारत की है. पैसा हम धार्मिक स्थलों पर खर्च कर देंगे, समय हम धर्म की सोचने में बिता देंगे और मानवता धर्म के नाम पर दंगों की भेंट चढ़ा देंगे तो फिर ये धर्म कहाँ हुआ, अधर्म ही हुआ न!
वैसे तो धर्म को नितांत व्यक्तिगत माना जाता है पर सड़क घेर कर धार्मिक अनुष्ठान करना, लाउडस्पीकर लगा कर लोगों को रात भर जगाना और जुलुस के नाम पर शहर को रोक देना कौन सा उचित है?
कहीं कब्ज़ा करना है तो वहाँ एक धार्मिक स्थल बना दो, ये नीति है कई भारतीयों की.
और अंत में इसका लाभ होता है धार्मिक गुरुओं को. धार्मिक स्थल इनकी दुकान बन जाते हैं और धार्मिक लोग इनके 'शिकार'.इनको ठगना और इनका शोषण करना इनका धर्म. हालत ये है कि पकड़े जाने और जेल पहुँचने के बाद भी इनसे लोगों का मोहभंग नहीं होता. धार्मिक स्थलों पर कब्जों के लिए हत्याएं भी होती रहती हैं और बहुत से धार्मिक गुरु जो हमें मोहमाया से दूर और निर्भीक रहने का पाठ पढ़ाते रहते हैं, स्वयं सुरक्षा घेरे में कारों और हवाई जहाजों में घूमते रहते हैं.
धार्मिक होना कुछ गलत नहीं, अपने विश्वास और श्रद्धा को अपनी दुर्बलता न बनने दें. ईश्वर को किसी भी रूप में मानते हों, उसके नाम पर उसके किसी 'दलाल' को स्थान न दें. अपनी आँखें और मस्तिष्क को खुला रखें.
मुझे पता है कि ये विषय संवेदनशील है पर अपनी संवेदनाए भारत के सन्दर्भ से भी जोड़ें.
और आप पायेंगे कि जब भारत शक्तिशाली होता है तो आपको भी उत्थान का पूर्ण अवसर प्राप्त होता है.



Tuesday, April 19, 2016

भविष्य को निगलती २२ की विषबेल

ये पोस्ट लिखने से पहले मै ये स्पष्ट कर दूँ कि मुझे व्यक्तिगत रूप से किसी भी खेल से कोई द्वेष नहीं है और न ही मेरी मंशा किसी भी खेल पर प्रतिबन्ध उठाने की है. यहाँ  क्रिकेट का वर्णन भारतीय परिदृश्य में हो रहा है और भारतीय समाज पर पड़ने वाले इसके प्रभाव का आकलन किया जा रहा है.
आइये पहले क्रिकेट के इतिहास को समझ लें. भारत पर अधिकार जमाने वाले अंग्रेजों के पास भारत आकर कुछ खास काम नहीं हुआ करता था और अपना समय थोक के भाव में गुजारने के लिए उन्हें एक बड़े मनोरंजन स्त्रोत की आवश्यकता थी. ऐसे में उन्होंने क्रिकेट को चुना. क्रिकेट उनके लिए पूरी तरह से एक समय व्यतीत  करने वाला  खेल था जिसे  किसी  भी मैदान, गली या नुक्कड़ में शुरू किया जा सकता था. आज भी क्रिकेट के मैदान की लम्बाई चौड़ाई नियत नहीं है. पहले तो इस खेल की ये हालत थी कि ये हफ़्तों भी चल सकता था . नियम ये था कि दोनों टीमों के सभी खिलाड़ी  दो पारियां पूरी पूरी खेलेंगे और फिर विजेता घोषित किया जाएगा. अब आप अंदाज लगा सकते हैं कि ये कितना समय लेता होगा. आज का टेस्ट मैच तो इसका एक 'संक्षिप्त' रूप समझिए.
अब ये समझा जाए कि ये भारतीयों का पसंदीदा खेल कैसे बन गया. दरअसल मुंबई में रहने वाले कुछ पारसियों ने अंग्रेजों को ये दिखाने के लिए ये खेलना शुरू किया कि -'देखो, हम अपने 'मालिक' लोगों के पक्के वाले गुलाम हैं और हम भी ये साहबों वाला खेल खेल सकते हैं.'
और फिर ये विषबेल ऐसी फैली कि ये भारत के लोकप्रिय खेल हॉकी को नष्ट करने के बाद सभी खेलों पर हावी हो गई.
क्रिकेट में क्या बुराई है?
खेल के तौर पर कोई खेल बुरा नहीं और क्रिकेट भी इसका अपवाद नहीं पर अगर इसमें लगने वाले समय को देखा जाए तो ये हमारे देश के लिए किसी भी तरह से उपयुक्त नहीं. जरा सोचिये, आज जो टी-२० मैच होते हैं और जो क्रिकेट का सबसे छोटा प्रारूप हैं, भी लगभग पूरा दिन खा जाते हैं. पूरा देश अपने काम धंधे छोड़ कर स्कोर पर कान गड़ा लेता है. ऐसे में भारत की समग्र आर्थिक हानि का आकलन किया जाए तो बहुत अधिक बैठेगा. एक छोटे दुकानदार से भी पूछिए तो वो कहेगा-' आज कुछ ज्यादा दुकानदारी नहीं हुई. क्रिकेट मैच जो था.' ऐसे में पूरे देश की आर्थिक गतिविधियों के बारे में सोचिये.
इसकी दीवानगी के कारण ही इस पर रोज करोणों का सट्टा लगता है और आये दिन सटोरिये पकड़े जाते हैं. सभी जानते हैं कि सट्टा जुए का ही एक रूप है और जुआ कितने परिवारों को बर्बाद कर देता है.
मजे की बात ये है कि इंग्लैण्ड और आस्ट्रेलिया जैसे देशों का ये प्रमुख खेल नहीं है. दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड भारत का ही है और वहाँ भी पैसे की इतनी मारामारी है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड का सदस्य बनने के लिए लोग पूरा जोर लगा देते हैं.
क्रिकेट के कुछ कड़वे पक्ष और भी हैं. कारगिल संघर्ष, केदारनाथ दुर्घटना जैसी राष्ट्रीय आपदाओं के समय भी ये खेल निर्बाध चल रहा था और लोगों का ध्यान देश की सुरक्षा या नागरिकों की मृत्यु जैसे गंभीर विषयों के स्थान पर क्रिकेट में था.
तो क्या क्रिकेट को खत्म कर दिया जाए? ये एक अतिशयोक्तिपूर्ण सन्देश होगा. इसे भी खेल की तरह ही खेला जाए और इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को हटाया जाए. दूसरे खेलों को महत्व दिया जाए ताकि हम खेलों के महाकुम्भ ओलम्पिक से कुछ पदक ला सकें.
हमें और आपको भी 'स्कोर क्या हुआ है?' की आदत छोड़नी होगी वरना भारत में बढ़ती ये विषबेल बाकि सभी को निगल जायेगी. वो भी जड़ों सहित.



Monday, April 18, 2016

फसल से फासले का फैसला


तमाम सड़कें, कालोनियां और फैक्ट्रियां बनने के बाद भी भारत में खेती की जमीन का रकबा बहुत अधिक है. खेती पर गुजर बसर करने वाले लोग भी कम नहीं हैं. हम लोग इन्हें किसान कहते हैं.
किसान के रेखा चित्रों को देखें तो हम पायेंगे कि सैकणों वर्ष में किसान की स्थिति वैसी ही है. किसान का नाम लेते ही एक व्यक्ति कल्पना में आता है जो आधी कसी धोती पहना है, ऊपर से एक फटा सा आधी बाजू का कुरता.
शर्म की बात ये है कि हमने अभी तक इस किसान और इसके काम के महत्व को न समझा और न समझने की कोशिश की. सूखे खेतों में बैठा किसान, आत्महत्या करता किसान, कर्जे में डूबा किसान- कुछ ऐसी ही छवियाँ रह गई हैं. खेती से धनी हुए कुछ लोगों ने तो इसका रूप ही बदल दिया. वे औषधि उगाने लगे, विदेशी फूल उगाने लगे और उन्हें अपने खेतों को खेत नहीं 'फार्म हॉउस' कहलवाना अच्छा लगने लगा. और फिर कारों में घूमते ये किसान हमारे पहले वर्णित किसानों को घृणा की दृष्टि से देखने लगे.
आज जब तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है, भारतीय किसान अब भी वही बारिश और दलालों पर निर्भर है. अगर इन खेतों में सही तकनीक, उपकरण और संसाधन उपयोग में लाये जाएँ तो हम अगर विश्वभर नहीं तो कम से कम विश्व की एक बड़ी आबादी को अपनी उपज की आपूर्ति तो कर ही सकते हैं. वो भी सभी भारतीयों का पेट भरने के बाद.
लेकिन ये सब तो फिलहाल हास्य ही लगता है. स्थिति ये है कि कभी फसल सही हो भी जाए तो उसे संभल कर रखने के लिए भंडारगृह तक नहीं होते. दलाल अब भी फसल औने पौने में बिकवाने को तत्पर रहते हैं और फसल अच्छी होने के बावजूद किसान वही रहता है- 'एक गरीब किसान'.
मेरे विचार से कोई मुश्किल उपाय नहीं हैं. बस सही मात्र में अच्छे अनाजघर बनवा दिये जाएँ, दलालों का नेटवर्क खत्म किया जाए और किसानों की सही समय पर तकनीकी मदद की जाए तो फायदा किसानो को तो मिलेगा ही, भारत से भुखमरी भी बहुत हद तक मिट जायेगी.
यक्ष प्रश्न ये है कि सबका पेट भरने वाला कृषक आखिर खुद क्यों भूखा रहे? सही मायने में वो छप्पन भोग का अधिकारी है.
बस अब उस अधिकारी को ये अधिकार देगा कौन?

Sunday, April 17, 2016

ऑर्डर, ऑर्डर, ऑर्डर, ऑर्डर, ऑर्डर, ऑर्डर, ऑर्डर.....

अभी उत्तर प्रदेश के दस न्यायाधीशों को जबरन रिटायरमेंट दे दिया गया. उनके ऊपर गंभीर आरोप थे.
गंभीर आरोपों पर सिर्फ रिटायरमेंट ? पता नहीं कितने गलत और पक्षपाती फैसले करके इन न्यायाधीशों ने कितनी बार अन्याय को न्याय का रूप दिया होगा? सैकणों लोगों को सही होने के बावजूद गलत न्याय की त्रासदी झेलनी पड़ी होगी. इनमे से कई तो आर्थिक रूप से इतने संपन्न भी नहीं होंगे कि आगे की अदालत में इन फैसलों के खिलाफ अपील कर सकें.
दूसरी बात ये है कि ये तो भ्रष्टाचार का इनाम हो गया? भला इन सजा सुनाने वालों को सजा क्यों नहीं सुनाई जा सकती? इससे पहले भी हाईकोर्ट, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के जज भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए हैं. एक जज ने तो एक महिला वादी के सामने अश्लील प्रस्ताव भी रख दिया था. मेरे विचार से इन लोगों को तो औरों से कहीं अधिक कष्टदायी सजा होनी चाहिए क्योंकि ये उस कुर्सी पर बैठे हैं जहाँ लोग न्याय की उम्मीद लेकर आते हैं.
दरअसल भारतीय न्यायालय बदइंतजामी और लापरवाही का एक नमूना बन कर रह गए हैं. लाखों लंबित मुक़दमे और इसके चक्कर काटते वादी देख कर आप और हमें यही लगता है कि भारत की इतनी जनसँख्या के चलते मुक़दमे समय पर निपटाना मुमकिन नहीं पर मै आपको बता दूँ कि ऐसा बिलकुल नहीं है. सन २०१२ में हुए एक सर्वे से पता लगा है कि अगर जज और वकील इमानदारी से काम करें तो ये सभी मुकदमे सही समय पर निपटाए जा सकते हैं. किन्तु इसके न होने पीछे बड़ा कारण जजों का भ्रष्ट होना, निकम्मापन और वकीलों की चालाकी है.
जो कोर्ट जाते रहते हैं उन्हें पता है कि कोर्ट में तारीख लेना कितना आसान है. फैसला अपने पक्ष में जाता न दिखे, आप कोर्ट न जाने का बहाना ढूँढ रहे हों, आपको अभी जज से 'सेटिंग' करनी है....कारण कोई भी हो, बस मुंशी को रकम खिलाइये और आपको आगे की तारीख मिल जायेगी. फिर दूसरा पक्ष लाख सर मारता रहे.तारीख देने मेंवकीलों  का भी बहुत  फायदा   होता है क्योंकि वो हर तारीख पर अपनी फीस पहले रखवा लेते हैं. मतलब जितनी ज्यादा तारीखें, उतना ही उनकी जेब गर्म.
ऊपर से कोर्ट की साल में करीब ६५ दिन की छुट्टियाँ. इनका औचित्य तो मुझे क्या, किसी को भी शायद ही समझ आता होगा? ये भी कोई स्कूल हैं जो बच्चे बीमार पड़ जायेंगे? दो महीने में तो कितने ही मामले निपटाए जा सकते हैं.
तो इन छोटे बड़े कारणों के चलते हमें इन्साफ मिलता है पर कभी गलत, तो कभी अधूरा  तो कभी इतने समय बाद जब उसका वास्तविक उद्देश्य खत्म हो जाता है और ये सिलसिला न थमा है, न सुधरा है.....
लगता है अब इन अदालती लोगों के दिमाग पर हथौड़ा बजाने का वक़्त आ चुका है.




Wednesday, April 13, 2016

डकैती की नई दुकान- प्राइवेट शिक्षा संसथान

मेरे पिछले एक पोस्ट में सरकारी शिक्षा संस्थानों की बदहाली और उन पर खर्च होने वाली सरकारी रकम का जिक्र किया गया है. इन संस्थानों की बदहाली ने ही व्यक्तिगत या प्राइवेट शिक्षा संस्थानों को फलने फूलने का मौका दिया. इसमें कुछ गलत नहीं था क्योंकि सरकार हर जगह स्कूल नहीं खोल सकती. बाद में तो इन संस्थानों को सरकार की ओर से लीज़ पर जमीन भी उपलब्ध कराई गई और पहले से चल रहे स्कूलों और कालेजों को गरीब और पिछड़े वर्गों को प्रवेश देने पर वित्तीय मदद की भी पेशकश की गई.
धीरे-धीरे ये छूट 'लूट' में तब्दील होती चली गई. प्राइवेट स्कूलों ने तो हद कर दी. बच्चों के प्रवेश पर आपको एक बड़ी रकम देनी होती है जिसका स्कूल कोई हिसाब नहीं देता. भारी भरकम फीस और हर चार दिन बाद किसी न किसी मद के नाम पर पैसा मंगाना यहाँ का शगल बन गया है. इसका अंजाम ये हुआ कि किराए के कमरों में चल रहे स्कूलों ने कुछ ही वर्षों में अपनी शानदार इमारतें खड़ी कर लीं.
प्राइवेट कॉलेज तो और भी आगे निकल गए. इनमे से तो कई खुले ही सरकारी वित्तीय लूट में हिस्सा बंटाने के लिए हैं. इनमे कितने ही छात्र पूरी तरह से फर्जी हैं और इनका टीचिंग स्टाफ पूरी तरह से नकारा. पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इनके पास छात्रवृत्ति का पूरा पैसा डकारने के लिए बने इन कॉलेजों को शिक्षा के स्तर की चिंता भी नहीं है.
शिक्षा विभाग के अधिकारी पूरी तरह से इनके साथ हैं क्योंकि विभाग तो एक बार में कई संस्थानों के साथ होता है. ऐसे में अगर एक संस्थान से बहुत छोटी रकम भी रिश्वत के रूप में ली जाये तो कुल मिला कर वो लाखों रूपये बैठती है.
अंततः निष्कर्ष यही निकलता है कि सरकारी शिक्षा बदहाल रहेगी और प्राइवेट संस्थान हमें लूटते रहेंगे और ये उन जगहों पर होगा जहाँ हमें जीवन में आगे बढ़ने और सच्चे नागरिक बनने के पाठ पढ़ाए जाते हैं.
कोई है जो इन पाठ पढ़ाने वालों को बता सके कि ये पाठ नहीं झूठ की पट्टी पढ़ाई जा रही है?



Tuesday, April 12, 2016

पहियों पर घूमता दबदबा

फायर ब्रिगेड की अपनी एक अलग ही गाड़ी होती है. एम्बुलेंस की पहचान भी अलग होती है. मिलेट्री के वहाँ अलग पहचाने जाते हैं और लाल नीली बत्ती लगी गाड़ियां मानो उनमे बैठने वाली हस्तियों के दबदबे का ऐलान करती चलती हैं.
पर भारत में क्या केवल यही लोग कुछ रसूख रखते हैं? दबदबा तो बहुत लोगों का है. बल्कि मुझे तो लगता है कि हर १०० कदम पर एक 'दबंग' बैठा है. अब दबंग बैठा ही रह जाए तो उसकी क्या बिसात? माना वो दबंग है और रसूख वाला है, पूरे शहर में उसका दबदबा है पर कोई अन्जान मूर्ख ये कैसे जाने? उसका बस चले तो हर निकलती साँस पर अपना प्रचार कर दे. उसके क़दमों में पड़े रहने वाले  चापलूस तो कुछ हद तक ही ये काम कर पाते हैं तो फिर सबको कैसे पता लगे?
तो उसका तरीका है आपका वाहन. वही बता सकता है वास्तव में आप क्या हैं????
आप छुटभैये नेता हैं, पार्टी का ध्वज लगाइए. बड़े हैं तो अपना पद भी लिखवा लें. अगर और बड़े हैं तो कोई जरुरत नहीं. फिर तो आप लाल बत्ती लिए हुए ही होंगे.
नेता ही नहीं, वास्तव में तो इन वाहनों पर लिखे हुए शब्द बताते हैं कि वास्तव में हमारे समाज में दबदबा किसका है और जिन लोगों से समाज की सेवा, सुरक्षा और चेतना की अपेक्षा की जाती है वो स्वयं के लिए मानो खतरे की चेतावनी बन रहे हैं.
गाड़ियों पर लिखा हुआ -
'प्रेस'
'पुलिस'
'पत्रकार'
'विधायक'
'वकील'
यहाँ तक कि मैंने 'पूर्व विधायक' भी लिखा देखा है. और हद तो तब होती है जब जाति सूचक शब्द लिखे होते हैं. मुझे तो ये बस एक ही अर्थ में दिखाई पड़ते हैं. और वो है - धमकी. ऐसा लगता है मानो ये पहिये पर चलती फिरती धमकियाँ हैं मानो कह रही हों कि हमसे पंगा मत लेना वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा.
आप बताइये, इसके अलावा इस 'लेखन का कोई और मंतव्य समझ में आता है आपको?
वो बात और है कि डॉक्टर की कार पर 'प्लस' जरा कम बने दिखाई पड़ेंगे क्योंकि उसे डर लगता है कि कोई रास्ते में रोक कर उसे अपने मरीज का हवाला न देने लगे.


Monday, April 11, 2016

ये खौफनाक खाकी

अगर आप एक सीधे सच्चे और क़ानून का पालन करने वाले व्यक्ति हैं तो एक पुलिस वाले को देखते ही आपके अंदर सुरक्षा और आत्मविश्वास का भाव जाग जाना चाहिए लेकिन अगर आप एक अराजक, अपराधी या  समाज विरोधी हैं तो वही पुलिस वाला आपके ह्रदय में भय का संचार कर सकता है.
भारत में इसका ठीक विपरीत होता है.
यानि एक सामान्य व्यक्ति जिसका अपराध या किसी समाज विरोधी कृत्य से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं होता, पुलिस से यूँ डरता है जैसे सबसे बड़ा अपराधी वही हो और अपराधी पुलिस थानों में बैठ कर चाय पीते हैं.
भारत में पुलिस अपराधी का ये गठजोड़ कब से शुरू हुआ, ये तो कहना मुश्किल है लेकिन अब ये ऐसा मजबूत बंधन बन चुका है जिसे तोड़ना असंभव सा ही दीखता है.हालत ये है कि बिना रिश्वत दिये आप अपना मोबाईल खोने की रिपोर्ट भी नहीं लिखवा सकते.
एक पक्ष पुलिस का भी है. पुलिस वालों की नौकरी समझो २४ घंटे की है. उन्हें स्वयं और परिवार के लिए वक़्त ही नहीं मिलता. किसी अपराधी को पकड़ भी लें तो राजनीतिक दबाव इतना हो जाता है कि उन्हें मामले से दूर रहने में ही अपनी भलाई नज़र आती है.
किन्तु मेरी दृष्टि में पुलिस विभाग के भ्रष्ट होने के लिए ये कारण कुछ सही नहीं. भ्रष्ट होने का इनका मेरी समझ में कारण है, अपराध के मूल तत्व को जानना और साथ में कानून की बारीकियां समझना. वो जानते हैं कब कैसे किसको बचाया जा सकता है और फिर कानून के फंदे से स्वयं को भी दूर रखा जा सकता है.
गणित बहुत छोटा सा है. अगर एक कोतवाली क्षेत्र में १०० अपराधी भी हैं और अगर हर अपराधी थाने में १००० रूपये प्रतिमाह भी देता है तो एक लाख रूपये महीना आया. ऐसे में कई पुलिस वालों को अपनी तनख्वाह भी खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती. इस विभाग पर पैसा फेंकने वाला अपराधी भी धीरे धीरे इस तंत्र को समझ जाता है और बेख़ौफ़ होता जाता है.
ज्यादा शोर मचता है तो किसी पुलिस वाले का तबादला या अस्थायी निलंबन कर दिया जाता है. ये भी उन्हें बचाने का बेहतरीन उपाय है क्योंकि इससे मामला दब जाता है और लोगों का ध्यान भटक जाता है.
सरकारें अपने गुर्गों की रक्षा में लगी रहती हैं और जनता फैसला नहीं कर पाती कि किसकी शरण में जाए.
पुलिस की
 या अपराधी की ?
हाँ, अब भी एक जगह ऐसी है जहाँ हमारी भारतीय पुलिस सबसे अच्छा प्रदर्शन करती दिखाई देती है. न तो कोई पुलिस वाला रिश्वत लेता है और न किसी नेता की सिफारिश सुनता है.
और वो है - भारतीय सिनेमा का पर्दा.

Sunday, April 10, 2016

अँधेरे से जगमगाते हम

बात मेरे बचपन की है. अकसर लाईट नहीं आ रही होती थी और हाथ का घुमाने वाला पंखा और मोमबत्ती हमारे जीवन के अभिन्न अंग होते थे. रात को सब लोग छत पर पहुँच जाते थे और वहाँ बिछी चारपाइयों पर लंबे हो लेते थे. सच बताऊँ तो छत पर सोना तो मानो पिकनिक की तरह लगता था जिसका हम बच्चे इंतज़ार
करते थे क्योंकि छत पर कूदा फांदी और देर रात तक धमाचौकड़ी का अपना ही मज़ा था. यहाँ तक कि अगर किसी रात बत्ती नहीं जाती थी तो हमारी बच्चा पार्टी मायूस हो जाती थी.
स्थितियां आज भी बहुत नहीं बदली हैं. बस मोमबत्ती और हाथ के पंखे की जगह इन्वर्टर ने ले ली है. विकसित देशों की पंक्ति में शुमार होने के लिए बेताब भारत को कम से कम अपनी मूलभूत सुविधाओं पर तो ध्यान देना होगा.बत्ती के मामले में हम पता नहीं किस हिसाब से उत्पादन बढ़ा रहे हैं. बढ़ती जनसँख्या और टेक्नॉलजी के चलते बत्ती पर निर्भरता पहले से कहीं अधिक हो गई है.
एक पॉवर हॉउस या बाँध बना कर उससे बत्ती प्राप्त करने तक अच्छा खासा समय लगता है. पर फिर अचानक पर्यावरण और जनहित कूद पड़ता है. मेरा कहना ये है कि ये सब निर्णय करने में समय लगना नहीं चाहिए. सभी मुद्दों को वक़्त रहते सुलझा लेना चाहिए और एक साथ कई प्रोजेक्ट शुरू करने चाहियें ताकि आने वाले कल में तो कम से कम बेहतर हो सकें.
साथ ही बिजली चोरों की बात. बिजली चोरी तो वास्तव में एक अभिशाप है. इसके कई कारण हैं. बिजली चोरी करने वाले का बिल सही मायने में वो चुकाते हैं जो इमानदारी से इसका उपयोग कर रहे हैं. चोरी करने वाला एक की जगह १०० यूनिट खर्च करता है क्योंकि उसे पता है बिल तो आना नहीं है. उद्योग तो एक महीने में उतनी बिजली चोरी कर सकते हैं जितना शहर की एक कोलोनी एक वर्ष में न कर पाए.
तो इन्हें कैसे रोकें? रोक तो तब पायेंगे जब बिजली वाले खुद इनके साथ न हों. ये लोग इन चोरों को ढूंढते हैं, इनका बिल कम करवाते हैं और अपनी जेबें भरते हैं. ऐसे में ईमानदार उपभोक्ता अपने आप को ठगा हुआ महसूस करता है.
और भारतीय मोमबत्तियों और इन्वर्टरों के सहारे अपना जीवन गुजारने को मजबूर हैं.



Saturday, April 9, 2016

युगपुरुषों का युग

समाज विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों का समूह होता है.इनमे अधिकांश साधारण जन होते हैं, कुछ विशेष होते हैं, कुछ अति विशेष और कुछ वास्तव में महान. यहाँ 'महापुरुष' कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि ये उपाधि स्त्री को भी प्रदत्त की जा सकती है. 
भारतीय समाज भी इसका अपवाद नहीं रहा है. हमारे देश में बहुत से महान लोगों को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगा कर या फिर जान देकर भी भारत का मस्तक विश्व भर में ऊँचा किया है. भारतीय समाज से कई कुरीतियों को मिटाने और नव जागरण जगाने में इनका बहुत योगदान रहा है. ऐसा भी नहीं है कि आज ये परम्परा खत्म हो गई है. आज भी समाज का उत्थान करने के लिए लोग आगे आते हैं और वास्तव में परोपकार में लगे रहते हैं.
अब जरा भारत के वर्तमान सन्दर्भ में इसकी बात करते हैं. हमारे राजनीतिज्ञ इन महान विभूतियों को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करते हैं. किस महान विभूति का कहाँ पर किस प्रकार उपयोग किया जाए, ये इनके वोट बैंक पर निर्भर करता है. उस विभूति का चुनाव भी इसी आधार पर होता है. कहने का अर्थ ये है कि इन्हें ये प्रेरणा का श्रोत नजर आते हैं मगर केवल लोगों को लुभाने के लिए. उनके आदर्शों, उनके कार्यों, उनके बलिदानों से इनका दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं.
जनता को समझना होगा कि महान विभूतियाँ किसी की बपौती नहीं. हमें भरमाने और उपयोग करने की तो बिलकुल नहीं. 
क्योंकि महानता समाज की विरासत होती है.

Friday, April 8, 2016

प्रजातंत्र, लोकतंत्र, जनतंत्र, गणतंत्र या गड़बड़तंत्र

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है. लोकतंत्र भी ऐसा वैसा नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र. हम भारतीय अपना नेता खुद चुन सकते हैं और उसकी मनमानी के खिलाफ आवाज़ उठा सकते हैं. भारत का संविधान कहता है कि 'जनता की सरकार, जनता के द्वारा'.
पर क्या वास्तव में ऐसा है?
हम चुनते जरुर हैं पर हमारे मनोमस्तिष्क पहले ही तैयार कर दिये जाते हैं कि हमे किसे चुनना है. चुनाव से पहले हमें हमारा धर्म, क्षेत्र और जाति सब याद दिला दी जाती है. 
कहने को लोकतंत्र है पर ये दिखाई देता है केवल चुनाव से कुछ समय पहले जब हमारे नेता हमारे बीच हाथ जोड़े खड़े होते हैं. यूँ तो हम उन्हें जब चाहे हटा सकते हैं पर पहले तो हम आगे ही नहीं आते और अगर ये अतिशयोक्ति हो भी जाए तो हमें पता चलता है कि एक तानाशाह को हटा कर हमने दूसरा बैठा दिया है. अगर ये नेता जनता की सेवा वास्तव में ही करना चाहते तो क्यों चुनावों के समय धांधली होती, मतपत्र लूटे जाते और भला क्यों ये आपस में लड़ते? भई, सेवा ही तो करनी है, कोई भी कर ले. सत्य तो ये है कि इन्हें अपनी और अपने परिवार की जीवें भरनी हैं और हो सकता है इन्हें इसके लिए केवल ५ वर्ष ही मिलें.
और ५ वर्ष के बाद? फिर हमारी 'सेवा' करने के लिए एक नया नेता आ खड़ा होता है जिसकी सोच ठीक यही होती है. सभी ऐसे नहीं हैं पर अगर कुछ सच्चे हैं तो वो समाज पर कोई खास फर्क नहीं डाल सकते. 
मेरा मानना है कि चुनावी घोषणापत्र केवल वादे न होकर एक शर्त होनी चाहिए. पहले तो सबसे पूछा जाना चाहिए कि आप ये वादे कैसे पूरे करेंगे और चुनाव के बाद अगर कोई ऐसा न कर पाए तो उसे जनता को ठगने के जुर्म में जेल में डाल देना चाहिए.
लेकिन फिर वही बात !......जेल में डालेगा कौन? यहाँ तो जेल में बैठे लोगों की मिजाजपुर्सी करने के लिए भी अच्छा 'जनतंत्र' होता है.

Thursday, April 7, 2016

ये हास्यास्पद वैश्विक खुलासे

अभी कुछ दिनों पहले काले धन से जुड़े 'पनामा फोसेंका' नाम के कुछ गोपनीय कागजात लीक हुए हैं. इनमे विश्व भर के नेताओं, उद्योगपतियों और नामचीन हस्तियों के नाम हैं और उनमे से कुछ भारत की भी हैं. वैसे ये 'कुछ' भी ५०० के करीब हैं और इनमे से अगर प्रत्येक ने केवल १००० करोड़ भी जमा किये हों तो ये इतनी रकम बनती है कि भारत के बड़े हिस्से को पल्लवित किया जा सकता है.
कुछ वर्षों पहले ऐसा ही खुलासा विकिलीक्स ने किया था जिसमे विश्व भर की कूटनीतिक चालें दिखाई गई थीं.
इन दोनों खुलासों के सन्दर्भ में भारत में तो बस एक ही प्रतिक्रिया होती है-
'रखो ये कचरा कागजातों का बण्डल अपने पास और भाड़ में जाओ.'
कुछ लोग शोर मचाते हैं पर फिर वो 'पता नहीं कैसे' चुप होकर बैठ जाते हैं. वैसे भी खुलासे के बाद सबको पता होता है कि अगर ज्यादा शोर मचाया तो गाज उन पर गिर सकती है. काला धन किसके पास नहीं, राजनीतिक कमीनापन किसको भला नहीं छूकर गया है, ऊपर चढ़ने के लिए कौन जोड़ तोड़ और अपराध का सहारा नहीं ले रहा? तो फिर कौन किसे दोषी साबित करे? खास तौर पर तब जब सबको एक दूसरे की असलियत मालूम हो?
भारत में तो हालत ये है कि किसी का स्टिंग ऑपरेशन हो जाए जो मेरे विचार में दोषी के लिए एक पक्के सबूत की तरह काम कर सकता है, पर उस व्यक्ति को केवल 'बर्खास्त' किया जाता है. पता नहीं ये सजा होती है या इनाम क्योंकि ऐसा करने से वो व्यक्ति जनता की याददाश्त से जल्दी ही दूर चला जाता है.
पर इसमें भी एक बेहतर पक्ष है. यहाँ हमारी सहनशीलता, धैर्य और सहयोग की भावना अपने चरम पर पहुँच जाती है.
यही तो हमारी परंपरा है.