Sunday, April 10, 2016

अँधेरे से जगमगाते हम

बात मेरे बचपन की है. अकसर लाईट नहीं आ रही होती थी और हाथ का घुमाने वाला पंखा और मोमबत्ती हमारे जीवन के अभिन्न अंग होते थे. रात को सब लोग छत पर पहुँच जाते थे और वहाँ बिछी चारपाइयों पर लंबे हो लेते थे. सच बताऊँ तो छत पर सोना तो मानो पिकनिक की तरह लगता था जिसका हम बच्चे इंतज़ार
करते थे क्योंकि छत पर कूदा फांदी और देर रात तक धमाचौकड़ी का अपना ही मज़ा था. यहाँ तक कि अगर किसी रात बत्ती नहीं जाती थी तो हमारी बच्चा पार्टी मायूस हो जाती थी.
स्थितियां आज भी बहुत नहीं बदली हैं. बस मोमबत्ती और हाथ के पंखे की जगह इन्वर्टर ने ले ली है. विकसित देशों की पंक्ति में शुमार होने के लिए बेताब भारत को कम से कम अपनी मूलभूत सुविधाओं पर तो ध्यान देना होगा.बत्ती के मामले में हम पता नहीं किस हिसाब से उत्पादन बढ़ा रहे हैं. बढ़ती जनसँख्या और टेक्नॉलजी के चलते बत्ती पर निर्भरता पहले से कहीं अधिक हो गई है.
एक पॉवर हॉउस या बाँध बना कर उससे बत्ती प्राप्त करने तक अच्छा खासा समय लगता है. पर फिर अचानक पर्यावरण और जनहित कूद पड़ता है. मेरा कहना ये है कि ये सब निर्णय करने में समय लगना नहीं चाहिए. सभी मुद्दों को वक़्त रहते सुलझा लेना चाहिए और एक साथ कई प्रोजेक्ट शुरू करने चाहियें ताकि आने वाले कल में तो कम से कम बेहतर हो सकें.
साथ ही बिजली चोरों की बात. बिजली चोरी तो वास्तव में एक अभिशाप है. इसके कई कारण हैं. बिजली चोरी करने वाले का बिल सही मायने में वो चुकाते हैं जो इमानदारी से इसका उपयोग कर रहे हैं. चोरी करने वाला एक की जगह १०० यूनिट खर्च करता है क्योंकि उसे पता है बिल तो आना नहीं है. उद्योग तो एक महीने में उतनी बिजली चोरी कर सकते हैं जितना शहर की एक कोलोनी एक वर्ष में न कर पाए.
तो इन्हें कैसे रोकें? रोक तो तब पायेंगे जब बिजली वाले खुद इनके साथ न हों. ये लोग इन चोरों को ढूंढते हैं, इनका बिल कम करवाते हैं और अपनी जेबें भरते हैं. ऐसे में ईमानदार उपभोक्ता अपने आप को ठगा हुआ महसूस करता है.
और भारतीय मोमबत्तियों और इन्वर्टरों के सहारे अपना जीवन गुजारने को मजबूर हैं.



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