अगर आप एक सीधे सच्चे और क़ानून का पालन करने वाले व्यक्ति हैं तो एक पुलिस वाले को देखते ही आपके अंदर सुरक्षा और आत्मविश्वास का भाव जाग जाना चाहिए लेकिन अगर आप एक अराजक, अपराधी या समाज विरोधी हैं तो वही पुलिस वाला आपके ह्रदय में भय का संचार कर सकता है.भारत में इसका ठीक विपरीत होता है.
यानि एक सामान्य व्यक्ति जिसका अपराध या किसी समाज विरोधी कृत्य से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं होता, पुलिस से यूँ डरता है जैसे सबसे बड़ा अपराधी वही हो और अपराधी पुलिस थानों में बैठ कर चाय पीते हैं.
भारत में पुलिस अपराधी का ये गठजोड़ कब से शुरू हुआ, ये तो कहना मुश्किल है लेकिन अब ये ऐसा मजबूत बंधन बन चुका है जिसे तोड़ना असंभव सा ही दीखता है.हालत ये है कि बिना रिश्वत दिये आप अपना मोबाईल खोने की रिपोर्ट भी नहीं लिखवा सकते.
एक पक्ष पुलिस का भी है. पुलिस वालों की नौकरी समझो २४ घंटे की है. उन्हें स्वयं और परिवार के लिए वक़्त ही नहीं मिलता. किसी अपराधी को पकड़ भी लें तो राजनीतिक दबाव इतना हो जाता है कि उन्हें मामले से दूर रहने में ही अपनी भलाई नज़र आती है.
किन्तु मेरी दृष्टि में पुलिस विभाग के भ्रष्ट होने के लिए ये कारण कुछ सही नहीं. भ्रष्ट होने का इनका मेरी समझ में कारण है, अपराध के मूल तत्व को जानना और साथ में कानून की बारीकियां समझना. वो जानते हैं कब कैसे किसको बचाया जा सकता है और फिर कानून के फंदे से स्वयं को भी दूर रखा जा सकता है.गणित बहुत छोटा सा है. अगर एक कोतवाली क्षेत्र में १०० अपराधी भी हैं और अगर हर अपराधी थाने में १००० रूपये प्रतिमाह भी देता है तो एक लाख रूपये महीना आया. ऐसे में कई पुलिस वालों को अपनी तनख्वाह भी खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती. इस विभाग पर पैसा फेंकने वाला अपराधी भी धीरे धीरे इस तंत्र को समझ जाता है और बेख़ौफ़ होता जाता है.
ज्यादा शोर मचता है तो किसी पुलिस वाले का तबादला या अस्थायी निलंबन कर दिया जाता है. ये भी उन्हें बचाने का बेहतरीन उपाय है क्योंकि इससे मामला दब जाता है और लोगों का ध्यान भटक जाता है.
सरकारें अपने गुर्गों की रक्षा में लगी रहती हैं और जनता फैसला नहीं कर पाती कि किसकी शरण में जाए.
पुलिस की
या अपराधी की ?
हाँ, अब भी एक जगह ऐसी है जहाँ हमारी भारतीय पुलिस सबसे अच्छा प्रदर्शन करती दिखाई देती है. न तो कोई पुलिस वाला रिश्वत लेता है और न किसी नेता की सिफारिश सुनता है.
और वो है - भारतीय सिनेमा का पर्दा.

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