फायर ब्रिगेड की अपनी एक अलग ही गाड़ी होती है. एम्बुलेंस की पहचान भी अलग होती है. मिलेट्री के वहाँ अलग पहचाने जाते हैं और लाल नीली बत्ती लगी गाड़ियां मानो उनमे बैठने वाली हस्तियों के दबदबे का ऐलान करती चलती हैं.
पर भारत में क्या केवल यही लोग कुछ रसूख रखते हैं? दबदबा तो बहुत लोगों का है. बल्कि मुझे तो लगता है कि हर १०० कदम पर एक 'दबंग' बैठा है. अब दबंग बैठा ही रह जाए तो उसकी क्या बिसात? माना वो दबंग है और रसूख वाला है, पूरे शहर में उसका दबदबा है पर कोई अन्जान मूर्ख ये कैसे जाने? उसका बस चले तो हर निकलती साँस पर अपना प्रचार कर दे. उसके क़दमों में पड़े रहने वाले चापलूस तो कुछ हद तक ही ये काम कर पाते हैं तो फिर सबको कैसे पता लगे?
तो उसका तरीका है आपका वाहन. वही बता सकता है वास्तव में आप क्या हैं????
आप छुटभैये नेता हैं, पार्टी का ध्वज लगाइए. बड़े हैं तो अपना पद भी लिखवा लें. अगर और बड़े हैं तो कोई जरुरत नहीं. फिर तो आप लाल बत्ती लिए हुए ही होंगे.
नेता ही नहीं, वास्तव में तो इन वाहनों पर लिखे हुए शब्द बताते हैं कि वास्तव में हमारे समाज में दबदबा किसका है और जिन लोगों से समाज की सेवा, सुरक्षा और चेतना की अपेक्षा की जाती है वो स्वयं के लिए मानो खतरे की चेतावनी बन रहे हैं.
गाड़ियों पर लिखा हुआ -
'प्रेस'
'पुलिस'
'पत्रकार'
'विधायक'
'वकील'
यहाँ तक कि मैंने 'पूर्व विधायक' भी लिखा देखा है. और हद तो तब होती है जब जाति सूचक शब्द लिखे होते हैं. मुझे तो ये बस एक ही अर्थ में दिखाई पड़ते हैं. और वो है - धमकी. ऐसा लगता है मानो ये पहिये पर चलती फिरती धमकियाँ हैं मानो कह रही हों कि हमसे पंगा मत लेना वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा.
आप बताइये, इसके अलावा इस 'लेखन का कोई और मंतव्य समझ में आता है आपको?
वो बात और है कि डॉक्टर की कार पर 'प्लस' जरा कम बने दिखाई पड़ेंगे क्योंकि उसे डर लगता है कि कोई रास्ते में रोक कर उसे अपने मरीज का हवाला न देने लगे.
पर भारत में क्या केवल यही लोग कुछ रसूख रखते हैं? दबदबा तो बहुत लोगों का है. बल्कि मुझे तो लगता है कि हर १०० कदम पर एक 'दबंग' बैठा है. अब दबंग बैठा ही रह जाए तो उसकी क्या बिसात? माना वो दबंग है और रसूख वाला है, पूरे शहर में उसका दबदबा है पर कोई अन्जान मूर्ख ये कैसे जाने? उसका बस चले तो हर निकलती साँस पर अपना प्रचार कर दे. उसके क़दमों में पड़े रहने वाले चापलूस तो कुछ हद तक ही ये काम कर पाते हैं तो फिर सबको कैसे पता लगे?
तो उसका तरीका है आपका वाहन. वही बता सकता है वास्तव में आप क्या हैं????
आप छुटभैये नेता हैं, पार्टी का ध्वज लगाइए. बड़े हैं तो अपना पद भी लिखवा लें. अगर और बड़े हैं तो कोई जरुरत नहीं. फिर तो आप लाल बत्ती लिए हुए ही होंगे.
नेता ही नहीं, वास्तव में तो इन वाहनों पर लिखे हुए शब्द बताते हैं कि वास्तव में हमारे समाज में दबदबा किसका है और जिन लोगों से समाज की सेवा, सुरक्षा और चेतना की अपेक्षा की जाती है वो स्वयं के लिए मानो खतरे की चेतावनी बन रहे हैं.
गाड़ियों पर लिखा हुआ -
'प्रेस'
'पुलिस'
'पत्रकार'
'विधायक'
'वकील'
यहाँ तक कि मैंने 'पूर्व विधायक' भी लिखा देखा है. और हद तो तब होती है जब जाति सूचक शब्द लिखे होते हैं. मुझे तो ये बस एक ही अर्थ में दिखाई पड़ते हैं. और वो है - धमकी. ऐसा लगता है मानो ये पहिये पर चलती फिरती धमकियाँ हैं मानो कह रही हों कि हमसे पंगा मत लेना वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा.
आप बताइये, इसके अलावा इस 'लेखन का कोई और मंतव्य समझ में आता है आपको?
वो बात और है कि डॉक्टर की कार पर 'प्लस' जरा कम बने दिखाई पड़ेंगे क्योंकि उसे डर लगता है कि कोई रास्ते में रोक कर उसे अपने मरीज का हवाला न देने लगे.


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