Wednesday, April 13, 2016

डकैती की नई दुकान- प्राइवेट शिक्षा संसथान

मेरे पिछले एक पोस्ट में सरकारी शिक्षा संस्थानों की बदहाली और उन पर खर्च होने वाली सरकारी रकम का जिक्र किया गया है. इन संस्थानों की बदहाली ने ही व्यक्तिगत या प्राइवेट शिक्षा संस्थानों को फलने फूलने का मौका दिया. इसमें कुछ गलत नहीं था क्योंकि सरकार हर जगह स्कूल नहीं खोल सकती. बाद में तो इन संस्थानों को सरकार की ओर से लीज़ पर जमीन भी उपलब्ध कराई गई और पहले से चल रहे स्कूलों और कालेजों को गरीब और पिछड़े वर्गों को प्रवेश देने पर वित्तीय मदद की भी पेशकश की गई.
धीरे-धीरे ये छूट 'लूट' में तब्दील होती चली गई. प्राइवेट स्कूलों ने तो हद कर दी. बच्चों के प्रवेश पर आपको एक बड़ी रकम देनी होती है जिसका स्कूल कोई हिसाब नहीं देता. भारी भरकम फीस और हर चार दिन बाद किसी न किसी मद के नाम पर पैसा मंगाना यहाँ का शगल बन गया है. इसका अंजाम ये हुआ कि किराए के कमरों में चल रहे स्कूलों ने कुछ ही वर्षों में अपनी शानदार इमारतें खड़ी कर लीं.
प्राइवेट कॉलेज तो और भी आगे निकल गए. इनमे से तो कई खुले ही सरकारी वित्तीय लूट में हिस्सा बंटाने के लिए हैं. इनमे कितने ही छात्र पूरी तरह से फर्जी हैं और इनका टीचिंग स्टाफ पूरी तरह से नकारा. पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इनके पास छात्रवृत्ति का पूरा पैसा डकारने के लिए बने इन कॉलेजों को शिक्षा के स्तर की चिंता भी नहीं है.
शिक्षा विभाग के अधिकारी पूरी तरह से इनके साथ हैं क्योंकि विभाग तो एक बार में कई संस्थानों के साथ होता है. ऐसे में अगर एक संस्थान से बहुत छोटी रकम भी रिश्वत के रूप में ली जाये तो कुल मिला कर वो लाखों रूपये बैठती है.
अंततः निष्कर्ष यही निकलता है कि सरकारी शिक्षा बदहाल रहेगी और प्राइवेट संस्थान हमें लूटते रहेंगे और ये उन जगहों पर होगा जहाँ हमें जीवन में आगे बढ़ने और सच्चे नागरिक बनने के पाठ पढ़ाए जाते हैं.
कोई है जो इन पाठ पढ़ाने वालों को बता सके कि ये पाठ नहीं झूठ की पट्टी पढ़ाई जा रही है?



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