अभी उत्तर प्रदेश के दस न्यायाधीशों को जबरन रिटायरमेंट दे दिया गया. उनके ऊपर गंभीर आरोप थे.
गंभीर आरोपों पर सिर्फ रिटायरमेंट ? पता नहीं कितने गलत और पक्षपाती फैसले करके इन न्यायाधीशों ने कितनी बार अन्याय को न्याय का रूप दिया होगा? सैकणों लोगों को सही होने के बावजूद गलत न्याय की त्रासदी झेलनी पड़ी होगी. इनमे से कई तो आर्थिक रूप से इतने संपन्न भी नहीं होंगे कि आगे की अदालत में इन फैसलों के खिलाफ अपील कर सकें.
दूसरी बात ये है कि ये तो भ्रष्टाचार का इनाम हो गया? भला इन सजा सुनाने वालों को सजा क्यों नहीं सुनाई जा सकती? इससे पहले भी हाईकोर्ट, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के जज भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए हैं. एक जज ने तो एक महिला वादी के सामने अश्लील प्रस्ताव भी रख दिया था. मेरे विचार से इन लोगों को तो औरों से कहीं अधिक कष्टदायी सजा होनी चाहिए क्योंकि ये उस कुर्सी पर बैठे हैं जहाँ लोग न्याय की उम्मीद लेकर आते हैं.
दरअसल भारतीय न्यायालय बदइंतजामी और लापरवाही का एक नमूना बन कर रह गए हैं. लाखों लंबित मुक़दमे और इसके चक्कर काटते वादी देख कर आप और हमें यही लगता है कि भारत की इतनी जनसँख्या के चलते मुक़दमे समय पर निपटाना मुमकिन नहीं पर मै आपको बता दूँ कि ऐसा बिलकुल नहीं है. सन २०१२ में हुए एक सर्वे से पता लगा है कि अगर जज और वकील इमानदारी से काम करें तो ये सभी मुकदमे सही समय पर निपटाए जा सकते हैं. किन्तु इसके न होने पीछे बड़ा कारण जजों का भ्रष्ट होना, निकम्मापन और वकीलों की चालाकी है.
जो कोर्ट जाते रहते हैं उन्हें पता है कि कोर्ट में तारीख लेना कितना आसान है. फैसला अपने पक्ष में जाता न दिखे, आप कोर्ट न जाने का बहाना ढूँढ रहे हों, आपको अभी जज से 'सेटिंग' करनी है....कारण कोई भी हो, बस मुंशी को रकम खिलाइये और आपको आगे की तारीख मिल जायेगी. फिर दूसरा पक्ष लाख सर मारता रहे.तारीख देने मेंवकीलों का भी बहुत फायदा होता है क्योंकि वो हर तारीख पर अपनी फीस पहले रखवा लेते हैं. मतलब जितनी ज्यादा तारीखें, उतना ही उनकी जेब गर्म.
ऊपर से कोर्ट की साल में करीब ६५ दिन की छुट्टियाँ. इनका औचित्य तो मुझे क्या, किसी को भी शायद ही समझ आता होगा? ये भी कोई स्कूल हैं जो बच्चे बीमार पड़ जायेंगे? दो महीने में तो कितने ही मामले निपटाए जा सकते हैं.
तो इन छोटे बड़े कारणों के चलते हमें इन्साफ मिलता है पर कभी गलत, तो कभी अधूरा तो कभी इतने समय बाद जब उसका वास्तविक उद्देश्य खत्म हो जाता है और ये सिलसिला न थमा है, न सुधरा है.....
लगता है अब इन अदालती लोगों के दिमाग पर हथौड़ा बजाने का वक़्त आ चुका है.
गंभीर आरोपों पर सिर्फ रिटायरमेंट ? पता नहीं कितने गलत और पक्षपाती फैसले करके इन न्यायाधीशों ने कितनी बार अन्याय को न्याय का रूप दिया होगा? सैकणों लोगों को सही होने के बावजूद गलत न्याय की त्रासदी झेलनी पड़ी होगी. इनमे से कई तो आर्थिक रूप से इतने संपन्न भी नहीं होंगे कि आगे की अदालत में इन फैसलों के खिलाफ अपील कर सकें.
दरअसल भारतीय न्यायालय बदइंतजामी और लापरवाही का एक नमूना बन कर रह गए हैं. लाखों लंबित मुक़दमे और इसके चक्कर काटते वादी देख कर आप और हमें यही लगता है कि भारत की इतनी जनसँख्या के चलते मुक़दमे समय पर निपटाना मुमकिन नहीं पर मै आपको बता दूँ कि ऐसा बिलकुल नहीं है. सन २०१२ में हुए एक सर्वे से पता लगा है कि अगर जज और वकील इमानदारी से काम करें तो ये सभी मुकदमे सही समय पर निपटाए जा सकते हैं. किन्तु इसके न होने पीछे बड़ा कारण जजों का भ्रष्ट होना, निकम्मापन और वकीलों की चालाकी है.
जो कोर्ट जाते रहते हैं उन्हें पता है कि कोर्ट में तारीख लेना कितना आसान है. फैसला अपने पक्ष में जाता न दिखे, आप कोर्ट न जाने का बहाना ढूँढ रहे हों, आपको अभी जज से 'सेटिंग' करनी है....कारण कोई भी हो, बस मुंशी को रकम खिलाइये और आपको आगे की तारीख मिल जायेगी. फिर दूसरा पक्ष लाख सर मारता रहे.तारीख देने मेंवकीलों का भी बहुत फायदा होता है क्योंकि वो हर तारीख पर अपनी फीस पहले रखवा लेते हैं. मतलब जितनी ज्यादा तारीखें, उतना ही उनकी जेब गर्म.ऊपर से कोर्ट की साल में करीब ६५ दिन की छुट्टियाँ. इनका औचित्य तो मुझे क्या, किसी को भी शायद ही समझ आता होगा? ये भी कोई स्कूल हैं जो बच्चे बीमार पड़ जायेंगे? दो महीने में तो कितने ही मामले निपटाए जा सकते हैं.
तो इन छोटे बड़े कारणों के चलते हमें इन्साफ मिलता है पर कभी गलत, तो कभी अधूरा तो कभी इतने समय बाद जब उसका वास्तविक उद्देश्य खत्म हो जाता है और ये सिलसिला न थमा है, न सुधरा है.....
लगता है अब इन अदालती लोगों के दिमाग पर हथौड़ा बजाने का वक़्त आ चुका है.


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