तमाम सड़कें, कालोनियां और फैक्ट्रियां बनने के बाद भी भारत में खेती की जमीन का रकबा बहुत अधिक है. खेती पर गुजर बसर करने वाले लोग भी कम नहीं हैं. हम लोग इन्हें किसान कहते हैं.
किसान के रेखा चित्रों को देखें तो हम पायेंगे कि सैकणों वर्ष में किसान की स्थिति वैसी ही है. किसान का नाम लेते ही एक व्यक्ति कल्पना में आता है जो आधी कसी धोती पहना है, ऊपर से एक फटा सा आधी बाजू का कुरता.
शर्म की बात ये है कि हमने अभी तक इस किसान और इसके काम के महत्व को न समझा और न समझने की कोशिश की. सूखे खेतों में बैठा किसान, आत्महत्या करता किसान, कर्जे में डूबा किसान- कुछ ऐसी ही छवियाँ रह गई हैं. खेती से धनी हुए कुछ लोगों ने तो इसका रूप ही बदल दिया. वे औषधि उगाने लगे, विदेशी फूल उगाने लगे और उन्हें अपने खेतों को खेत नहीं 'फार्म हॉउस' कहलवाना अच्छा लगने लगा. और फिर कारों में घूमते ये किसान हमारे पहले वर्णित किसानों को घृणा की दृष्टि से देखने लगे.आज जब तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है, भारतीय किसान अब भी वही बारिश और दलालों पर निर्भर है. अगर इन खेतों में सही तकनीक, उपकरण और संसाधन उपयोग में लाये जाएँ तो हम अगर विश्वभर नहीं तो कम से कम विश्व की एक बड़ी आबादी को अपनी उपज की आपूर्ति तो कर ही सकते हैं. वो भी सभी भारतीयों का पेट भरने के बाद.
लेकिन ये सब तो फिलहाल हास्य ही लगता है. स्थिति ये है कि कभी फसल सही हो भी जाए तो उसे संभल कर रखने के लिए भंडारगृह तक नहीं होते. दलाल अब भी फसल औने पौने में बिकवाने को तत्पर रहते हैं और फसल अच्छी होने के बावजूद किसान वही रहता है- 'एक गरीब किसान'.
मेरे विचार से कोई मुश्किल उपाय नहीं हैं. बस सही मात्र में अच्छे अनाजघर बनवा दिये जाएँ, दलालों का नेटवर्क खत्म किया जाए और किसानों की सही समय पर तकनीकी मदद की जाए तो फायदा किसानो को तो मिलेगा ही, भारत से भुखमरी भी बहुत हद तक मिट जायेगी.
यक्ष प्रश्न ये है कि सबका पेट भरने वाला कृषक आखिर खुद क्यों भूखा रहे? सही मायने में वो छप्पन भोग का अधिकारी है.
बस अब उस अधिकारी को ये अधिकार देगा कौन?

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