ये पोस्ट लिखने से पहले मै ये स्पष्ट कर दूँ कि मुझे व्यक्तिगत रूप से किसी भी खेल से कोई द्वेष नहीं है और न ही मेरी मंशा किसी भी खेल पर प्रतिबन्ध उठाने की है. यहाँ क्रिकेट का वर्णन भारतीय परिदृश्य में हो रहा है और भारतीय समाज पर पड़ने वाले इसके प्रभाव का आकलन किया जा रहा है.
आइये पहले क्रिकेट के इतिहास को समझ लें. भारत पर अधिकार जमाने वाले अंग्रेजों के पास भारत आकर कुछ खास काम नहीं हुआ करता था और अपना समय थोक के भाव में गुजारने के लिए उन्हें एक बड़े मनोरंजन स्त्रोत की आवश्यकता थी. ऐसे में उन्होंने क्रिकेट को चुना. क्रिकेट उनके लिए पूरी तरह से एक समय व्यतीत करने वाला खेल था जिसे किसी भी मैदान, गली या नुक्कड़ में शुरू किया जा सकता था. आज भी क्रिकेट के मैदान की लम्बाई चौड़ाई नियत नहीं है. पहले तो इस खेल की ये हालत थी कि ये हफ़्तों भी चल सकता था . नियम ये था कि दोनों टीमों के सभी खिलाड़ी दो पारियां पूरी पूरी खेलेंगे और फिर विजेता घोषित किया जाएगा. अब आप अंदाज लगा सकते हैं कि ये कितना समय लेता होगा. आज का टेस्ट मैच तो इसका एक 'संक्षिप्त' रूप समझिए.
अब ये समझा जाए कि ये भारतीयों का पसंदीदा खेल कैसे बन गया. दरअसल मुंबई में रहने वाले कुछ पारसियों ने अंग्रेजों को ये दिखाने के लिए ये खेलना शुरू किया कि -'देखो, हम अपने 'मालिक' लोगों के पक्के वाले गुलाम हैं और हम भी ये साहबों वाला खेल खेल सकते हैं.'
और फिर ये विषबेल ऐसी फैली कि ये भारत के लोकप्रिय खेल हॉकी को नष्ट करने के बाद सभी खेलों पर हावी हो गई.
क्रिकेट में क्या बुराई है?
खेल के तौर पर कोई खेल बुरा नहीं और क्रिकेट भी इसका अपवाद नहीं पर अगर इसमें लगने वाले समय को देखा जाए तो ये हमारे देश के लिए किसी भी तरह से उपयुक्त नहीं. जरा सोचिये, आज जो टी-२० मैच होते हैं और जो क्रिकेट का सबसे छोटा प्रारूप हैं, भी लगभग पूरा दिन खा जाते हैं. पूरा देश अपने काम धंधे छोड़ कर स्कोर पर कान गड़ा लेता है. ऐसे में भारत की समग्र आर्थिक हानि का आकलन किया जाए तो बहुत अधिक बैठेगा. एक छोटे दुकानदार से भी पूछिए तो वो कहेगा-' आज कुछ ज्यादा दुकानदारी नहीं हुई. क्रिकेट मैच जो था.' ऐसे में पूरे देश की आर्थिक गतिविधियों के बारे में सोचिये.
इसकी दीवानगी के कारण ही इस पर रोज करोणों का सट्टा लगता है और आये दिन सटोरिये पकड़े जाते हैं. सभी जानते हैं कि सट्टा जुए का ही एक रूप है और जुआ कितने परिवारों को बर्बाद कर देता है.
मजे की बात ये है कि इंग्लैण्ड और आस्ट्रेलिया जैसे देशों का ये प्रमुख खेल नहीं है. दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड भारत का ही है और वहाँ भी पैसे की इतनी मारामारी है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड का सदस्य बनने के लिए लोग पूरा जोर लगा देते हैं.
क्रिकेट के कुछ कड़वे पक्ष और भी हैं. कारगिल संघर्ष, केदारनाथ दुर्घटना जैसी राष्ट्रीय आपदाओं के समय भी ये खेल निर्बाध चल रहा था और लोगों का ध्यान देश की सुरक्षा या नागरिकों की मृत्यु जैसे गंभीर विषयों के स्थान पर क्रिकेट में था.
तो क्या क्रिकेट को खत्म कर दिया जाए? ये एक अतिशयोक्तिपूर्ण सन्देश होगा. इसे भी खेल की तरह ही खेला जाए और इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को हटाया जाए. दूसरे खेलों को महत्व दिया जाए ताकि हम खेलों के महाकुम्भ ओलम्पिक से कुछ पदक ला सकें.
हमें और आपको भी 'स्कोर क्या हुआ है?' की आदत छोड़नी होगी वरना भारत में बढ़ती ये विषबेल बाकि सभी को निगल जायेगी. वो भी जड़ों सहित.
आइये पहले क्रिकेट के इतिहास को समझ लें. भारत पर अधिकार जमाने वाले अंग्रेजों के पास भारत आकर कुछ खास काम नहीं हुआ करता था और अपना समय थोक के भाव में गुजारने के लिए उन्हें एक बड़े मनोरंजन स्त्रोत की आवश्यकता थी. ऐसे में उन्होंने क्रिकेट को चुना. क्रिकेट उनके लिए पूरी तरह से एक समय व्यतीत करने वाला खेल था जिसे किसी भी मैदान, गली या नुक्कड़ में शुरू किया जा सकता था. आज भी क्रिकेट के मैदान की लम्बाई चौड़ाई नियत नहीं है. पहले तो इस खेल की ये हालत थी कि ये हफ़्तों भी चल सकता था . नियम ये था कि दोनों टीमों के सभी खिलाड़ी दो पारियां पूरी पूरी खेलेंगे और फिर विजेता घोषित किया जाएगा. अब आप अंदाज लगा सकते हैं कि ये कितना समय लेता होगा. आज का टेस्ट मैच तो इसका एक 'संक्षिप्त' रूप समझिए.
अब ये समझा जाए कि ये भारतीयों का पसंदीदा खेल कैसे बन गया. दरअसल मुंबई में रहने वाले कुछ पारसियों ने अंग्रेजों को ये दिखाने के लिए ये खेलना शुरू किया कि -'देखो, हम अपने 'मालिक' लोगों के पक्के वाले गुलाम हैं और हम भी ये साहबों वाला खेल खेल सकते हैं.'
और फिर ये विषबेल ऐसी फैली कि ये भारत के लोकप्रिय खेल हॉकी को नष्ट करने के बाद सभी खेलों पर हावी हो गई.
क्रिकेट में क्या बुराई है?
खेल के तौर पर कोई खेल बुरा नहीं और क्रिकेट भी इसका अपवाद नहीं पर अगर इसमें लगने वाले समय को देखा जाए तो ये हमारे देश के लिए किसी भी तरह से उपयुक्त नहीं. जरा सोचिये, आज जो टी-२० मैच होते हैं और जो क्रिकेट का सबसे छोटा प्रारूप हैं, भी लगभग पूरा दिन खा जाते हैं. पूरा देश अपने काम धंधे छोड़ कर स्कोर पर कान गड़ा लेता है. ऐसे में भारत की समग्र आर्थिक हानि का आकलन किया जाए तो बहुत अधिक बैठेगा. एक छोटे दुकानदार से भी पूछिए तो वो कहेगा-' आज कुछ ज्यादा दुकानदारी नहीं हुई. क्रिकेट मैच जो था.' ऐसे में पूरे देश की आर्थिक गतिविधियों के बारे में सोचिये.
इसकी दीवानगी के कारण ही इस पर रोज करोणों का सट्टा लगता है और आये दिन सटोरिये पकड़े जाते हैं. सभी जानते हैं कि सट्टा जुए का ही एक रूप है और जुआ कितने परिवारों को बर्बाद कर देता है.
मजे की बात ये है कि इंग्लैण्ड और आस्ट्रेलिया जैसे देशों का ये प्रमुख खेल नहीं है. दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड भारत का ही है और वहाँ भी पैसे की इतनी मारामारी है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड का सदस्य बनने के लिए लोग पूरा जोर लगा देते हैं.
क्रिकेट के कुछ कड़वे पक्ष और भी हैं. कारगिल संघर्ष, केदारनाथ दुर्घटना जैसी राष्ट्रीय आपदाओं के समय भी ये खेल निर्बाध चल रहा था और लोगों का ध्यान देश की सुरक्षा या नागरिकों की मृत्यु जैसे गंभीर विषयों के स्थान पर क्रिकेट में था.
तो क्या क्रिकेट को खत्म कर दिया जाए? ये एक अतिशयोक्तिपूर्ण सन्देश होगा. इसे भी खेल की तरह ही खेला जाए और इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को हटाया जाए. दूसरे खेलों को महत्व दिया जाए ताकि हम खेलों के महाकुम्भ ओलम्पिक से कुछ पदक ला सकें.
हमें और आपको भी 'स्कोर क्या हुआ है?' की आदत छोड़नी होगी वरना भारत में बढ़ती ये विषबेल बाकि सभी को निगल जायेगी. वो भी जड़ों सहित.



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