Saturday, April 2, 2016

धर्म की राजनीति और राजनीति का धर्म

आजादी के इतने वर्षों बाद भी आज भारत अपनी मानसिक गुलामी से स्वतंत्र नहीं हो पाया है. यही कारण है  कि यहाँ आज भी राजनीति धर्म के कन्धों पर सवार होकर चलती है. उम्मीदवार खड़े होते हैं, विकास के वादे भी करते हैं पर अपना कार्यकाल पूरा होते होते वो लोगों को धर्मोंमुख राजनीति की ओर मोड़ने लगते हैं. इसकी मजबूत वजह है लोगों की धार्मिक मानसिकता और उनका अपना निकम्मापन. जनता के विकास के लिए मिला पैसा तो उनकी जेब में जा चुका. अब जब जनता को विकास नहीं दिखाई पड़ा तो वो शिकायत तो करेगी ही. ऐसे में बेहतर यही है कि जनता का ध्यान उन मुद्दों की ओर मोड दिया जाए जिनका विकास से कोई लेना देना ही नहीं है लेकिन वो मुद्दा इतना शक्तिशाली भी होना चाहिए कि लोग टूटी सड़कें,खराब बिजली आपूर्ति और बीमार जनसुविधाएँ  भूल जाएँ. इसका सबसे अच्छा विषय धर्म ही है. कुछ ही प्रयासों में लोगों को ये समझाया जा सकता है कि अगर उन्हें जिताया नहीं गया तो उनका धर्म सम्पूर्ण रूप से खतरे में है. अब बस उनकी जीत ही उनका समूल नाश होने से बचा सकती है.
इसका एक दूसरा तरीका भी है. किसी दूसरे धर्म के खिलाफ 'भड़काऊ और आपत्तिजनक' बयान दे मारो. बबाल मचेगा, चुनाव आयोग तक बात पहुंचेगी, हो सकता है उम्मीदवार के खिलाफ एफ.आई.आर. भी हो जाए पर इससे ऊपर कुछ नहीं होगा और उसकी जीत पक्की हो जायेगी. इसका दूसरा सबल पक्ष ये भी है कि इस एक बार के बयान के बाद आप अगले दो-चार चुनाव जीतने के दावेदार हो जाते हैं.
क्योंकि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार का बस एक ही धर्म होता है- कुर्सी.

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