Thursday, April 21, 2016

हर कदम पर कटोरा

भारत में अगर स्वरोजगार पर किताब लिखी जाए तो 'भिक्षा' उसमे प्रमुख रूप से वर्णित होनी चाहिए. आप कहीं भी चले जाइए, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मॉल, सड़क,चौराहे, मेला, पार्क, दुकान, मंदिर, मस्जिद, चर्च या फिर कोई भी सार्वजनिक स्थान, आपको एक न एक भिखारी मिल ही जाएगा. अगर इन सबसे बच कर आप घर पर बैठ जाएँ तो आपके दरवाजे पर ही आकर खड़ा हो जाएगा.
भीख माँगना किसी की मजबूरी हो सकती है पर भारत में तो ये सुसंगठित व्यापार बन गया है. पूरी तरह से समर्थ स्त्री, पुरुष इसे अपना रहे हैं. इसे चलाने वाले गिरोह बन गए हैं जो लोगों को अपंग  बना  कर उनसे भीख मंगवा रहे हैं . जिस उम्र में बच्चे खेल खिलौनों से खेलते हैं, उस उम्र में उनसे भीख मंगवाई जा रही है. अगर आप ट्रेन से २००  किलोमीटर का  सफर  तय करें तो आपको इस बीच कम से कम दस भिखारी तो मिल ही जायेंगे. मतलब हर २० किलोमीटर पर एक भिखारी. 
इसके पीछे हम भारतीयों की 'परोपकार' की भावना भी जिम्मेदार है. हम एक बार भी नहीं सोचते कि किसी शारीरिक रूप से समर्थ व्यक्ति को भीख देना तो उसका अपमान ही है जो कार्य करके स्वाभिमान से रोजी रोटी कमाना चाहता है. वास्तव में ये इतने बेचारे भी नहीं होते. आपसे मिलने वाली छोटी सी रकम को जोड़ा जाए तो इनका 'औसत' एक अच्छी खासी कमाई वाले से ऊपर बैठता है. आप इनसे काम करने को कहेंगे तो ये मुहँ बितरा देते हैं.
भिखारियों के गिरोह लाखों के वारे न्यारे कर रहे हैं. कुछ भिखारियों के बिस्तर में लाखों रूपये पाए गए हैं और कई भिखारियों का बैंक बैलेंस भी तगड़ा है. ऐसे में इनको भीख देना न तो हमारे लिए उचित है और न हमारे देश के लिए.
समाज सहयोग से चलता है. हमें समाज के गरीब और लाचार तबके को ऊपर उठाने में सहयोग जरूर करना चाहिए लेकिन कहीं ये सहयोग उन्हें किसी गलत दिशा में तो नहीं ले जा रहा या स्वाभिमानी लोगों को चोट तो नहीं पहुंचा रहा, ये देखना भी हमारी जिम्मेदारी है.
दान करना है तो जरूर करें, पर आपका ये दान सही व्यक्ति की सही मदद कर रहा है या नहीं, ये भी देखें.
वरना विश्व के नक़्शे में भारत को 'भिखारियों का देश' बनते देर नहीं लगेगी.




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