अभी पिछले एक पोस्ट में मैंने क्रिकेट के प्रति भारतीयों की दीवानगी और इससे होने वाले नुकसान की बात की थी.
आज एक रिपोर्ट में देखा कि गुजरात में एक राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज नूडल्स बेच कर अपनी आजीविका चला रही है. क्यों? क्योंकि उसके पास राइफल खरीदने के पैसे नहीं हैं. आज से करीब तीन वर्ष पहले एक पत्रिका में पढ़ी रिपोर्ट में मैंने भारतीय खिलाड़ियों को चाट, सब्जी बेचते यहाँ तक कि मजदूरी करते भी देखा. यहाँ तक कि ओलम्पिक में मेडल जीत कर आये पहलवान को अपने ही स्वागत समारोह में एक 'ऑटो' से जाना पड़ा था.
ऐसे में कौन से माता पिता अपने बच्चों को खेल के प्रति आकर्षित करना चाहेंगे?
खेलों की हालत बुरी है और बहुत बुरी है, इसे जानने के लिए कोई बहुत बड़ा खेल विशेषज्ञ होने की कोई आवश्यकता नहीं. आप अपने स्थानीय स्तर पर ही किसी खिलाड़ी से पूछ लें तो आपको समझ में आ जाएगा कि क्या चल रहा है. जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों से रिश्वत मांगी जाती है, सिफारिशों पर अयोग्य खिलाड़ी भर्ती कर लिए जाते हैं और अगर कोई इन चुनौतियों से जूझ कर वहाँ पहुँच भी जाए और जीत भी जाए तो उसकी कोई कद्र नहीं होती.
कुछ जगह खेलों में अच्छे मेडल पाना सरकारी नौकरी पाने का शॉर्टकट होता है. ये स्थिति भी ठीक नहीं. खिलाड़ी को वैसे ही इतनी सुविधाएँ मिल जानी चाहियें कि वो बस अपने खेल के बारे में सोचे और देश के लिए अधिकाधिक पदक जीत सके. हम भारत के गाँवों की ओर रूख कर सकते हैं जहाँ हमें विश्व के बेहतरीन एथलीट मिल सकते हैं. लंबी कूद, ऊँची कूद, दौड़, गोला फेंक इत्यादि तो ये खेल खेल में ही बहुत अच्छी कर लेते हैं. अगर इन्हें सँवारने को सही मार्गदर्शक मिल जाए तो इन्हें कौन रोक सकता है?
पर मार्गदर्शक तो कोई और मार्ग पर चल रहा होता है. ऊपर से निकम्मी सरकारी मशीनरी और अंत में वो धनवान कंपनियां जो इन खिलाड़ियों पर किसी हालत में एक रुपया नहीं लगाना चाहतीं.
नहीं तो किसकी औकात है कि सवा करोड़ की जनसँख्या वाले इस देश से पंगा ले ले.
आज एक रिपोर्ट में देखा कि गुजरात में एक राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज नूडल्स बेच कर अपनी आजीविका चला रही है. क्यों? क्योंकि उसके पास राइफल खरीदने के पैसे नहीं हैं. आज से करीब तीन वर्ष पहले एक पत्रिका में पढ़ी रिपोर्ट में मैंने भारतीय खिलाड़ियों को चाट, सब्जी बेचते यहाँ तक कि मजदूरी करते भी देखा. यहाँ तक कि ओलम्पिक में मेडल जीत कर आये पहलवान को अपने ही स्वागत समारोह में एक 'ऑटो' से जाना पड़ा था.
ऐसे में कौन से माता पिता अपने बच्चों को खेल के प्रति आकर्षित करना चाहेंगे?
खेलों की हालत बुरी है और बहुत बुरी है, इसे जानने के लिए कोई बहुत बड़ा खेल विशेषज्ञ होने की कोई आवश्यकता नहीं. आप अपने स्थानीय स्तर पर ही किसी खिलाड़ी से पूछ लें तो आपको समझ में आ जाएगा कि क्या चल रहा है. जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों से रिश्वत मांगी जाती है, सिफारिशों पर अयोग्य खिलाड़ी भर्ती कर लिए जाते हैं और अगर कोई इन चुनौतियों से जूझ कर वहाँ पहुँच भी जाए और जीत भी जाए तो उसकी कोई कद्र नहीं होती.कुछ जगह खेलों में अच्छे मेडल पाना सरकारी नौकरी पाने का शॉर्टकट होता है. ये स्थिति भी ठीक नहीं. खिलाड़ी को वैसे ही इतनी सुविधाएँ मिल जानी चाहियें कि वो बस अपने खेल के बारे में सोचे और देश के लिए अधिकाधिक पदक जीत सके. हम भारत के गाँवों की ओर रूख कर सकते हैं जहाँ हमें विश्व के बेहतरीन एथलीट मिल सकते हैं. लंबी कूद, ऊँची कूद, दौड़, गोला फेंक इत्यादि तो ये खेल खेल में ही बहुत अच्छी कर लेते हैं. अगर इन्हें सँवारने को सही मार्गदर्शक मिल जाए तो इन्हें कौन रोक सकता है?
पर मार्गदर्शक तो कोई और मार्ग पर चल रहा होता है. ऊपर से निकम्मी सरकारी मशीनरी और अंत में वो धनवान कंपनियां जो इन खिलाड़ियों पर किसी हालत में एक रुपया नहीं लगाना चाहतीं.
नहीं तो किसकी औकात है कि सवा करोड़ की जनसँख्या वाले इस देश से पंगा ले ले.


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