इस बारे में बात करने से पहले मुझे अपने बचपन का एक वाकया याद आता है. दिल्ली से मुंबई जाने वाली एक ट्रेन में सफर के दौरान हमारे डब्बे में कोई अफ़्रीकी सवार था. जब तक वो डब्बे में रहा, लोग उसकी खिल्ली उड़ाते रहे. वो हिंदी नहीं समझता था पर पर आज वो प्रताड़ना याद करके मेरी रूह काँप जाती है.
वो तो मेरा बचपन था पर आज बड़े होने के बाद मुझे पूरा विश्वास है कि हम भारतीय रंगभेद की मानसिकता में बुरी तरह जकड़े हुए हुए हैं. आज भी हमारी कहानियों में खलनायक 'काला और बेडौल' होता है और नायक 'गोरा और सुन्दर'.
ये 'गोरा' हमारे साथ हमारे दिलों से जुड़ा हुआ है. शादी करने वाले को 'गोरी कन्या' चाहिए, फिल्मों के पर्दों पर भी काले कलाकार या तो खलनायक होते हैं या फिर चल नहीं पाते. अभी कुछ दिनों पहले वेस्ट इंडीज की टीम ने टी-२० विश्व कप जीता था तो सोशल मीडिया पर उस टीम के खिलाडियों के रूप रंग को लेकर जिस तरह से मजाक उड़ाई गई उससे स्पष्ट हो गया कि काले लोगों की योग्यता हमें बर्दाश्त नहीं.
यही नहीं, आप किसी गोरे विदेशी पर्यटक को देख लीजिए. हम उसकी ओर ऐसे निहारते हैं मानो कह रहे हों कि 'तुम वास्तव में महान हो. हम काले लोग तुम्हारे स्वागत के योग्य कहाँ? ये तो तुम्हारा अहसान है कि तुम हमारे देश में भ्रमण करने आये हो.' मतलब यहाँ पर हीनता की भावना प्रबल हो जाती है.
रंगभेद का सबसे बड़ा उदाहरण गोरेपन की क्रीम की बेतहाशा बिक्री है. पहले गोरा बनाने वाली क्रीम आई, फिर मर्दों को गोरा बनाने के लिए अलग से क्रीम पेश की गई और उसके बाद कई और क्रीम बाजार में आ गई हैं जो अपने काम करने के साथ साथ गोरा भी बनाती हैं. ये 'गोरा चिट्टा' शब्द भारतीय मानव के एक अतिरिक्त गुण को प्रदर्शित करता है जबकि 'काले' को काला कम और 'काला-कलूटा' ज्यादा संबोधित किया जाता है.
आप कितना ही इनकार कर लें, किसी श्याम वर्णीय स्त्री या पुरुष को देखते ही हमारे मन में संशय का सागर हिलोरे लेने लगता है. कारण! काला तो है ही, पता नहीं कितना सच्चा होगा? कहीं चोर न हो?
ऐसे विचार रह रह कर उमड़ने घुमड़ने लगते हैं. काली लड़कियां कितनी भी गुणवान क्यों न हों, विवाह के लिए बहुत प्रतीक्षा करती हैं जबकि गोरी लड़कियों के रिश्ते पहले ही आने लगते हैं.
समानता पर भाषण देने वालों को समाज के इस पक्ष के प्रति भी जागरूक होना पड़ेगा.
वो तो मेरा बचपन था पर आज बड़े होने के बाद मुझे पूरा विश्वास है कि हम भारतीय रंगभेद की मानसिकता में बुरी तरह जकड़े हुए हुए हैं. आज भी हमारी कहानियों में खलनायक 'काला और बेडौल' होता है और नायक 'गोरा और सुन्दर'.
ये 'गोरा' हमारे साथ हमारे दिलों से जुड़ा हुआ है. शादी करने वाले को 'गोरी कन्या' चाहिए, फिल्मों के पर्दों पर भी काले कलाकार या तो खलनायक होते हैं या फिर चल नहीं पाते. अभी कुछ दिनों पहले वेस्ट इंडीज की टीम ने टी-२० विश्व कप जीता था तो सोशल मीडिया पर उस टीम के खिलाडियों के रूप रंग को लेकर जिस तरह से मजाक उड़ाई गई उससे स्पष्ट हो गया कि काले लोगों की योग्यता हमें बर्दाश्त नहीं.
यही नहीं, आप किसी गोरे विदेशी पर्यटक को देख लीजिए. हम उसकी ओर ऐसे निहारते हैं मानो कह रहे हों कि 'तुम वास्तव में महान हो. हम काले लोग तुम्हारे स्वागत के योग्य कहाँ? ये तो तुम्हारा अहसान है कि तुम हमारे देश में भ्रमण करने आये हो.' मतलब यहाँ पर हीनता की भावना प्रबल हो जाती है.
रंगभेद का सबसे बड़ा उदाहरण गोरेपन की क्रीम की बेतहाशा बिक्री है. पहले गोरा बनाने वाली क्रीम आई, फिर मर्दों को गोरा बनाने के लिए अलग से क्रीम पेश की गई और उसके बाद कई और क्रीम बाजार में आ गई हैं जो अपने काम करने के साथ साथ गोरा भी बनाती हैं. ये 'गोरा चिट्टा' शब्द भारतीय मानव के एक अतिरिक्त गुण को प्रदर्शित करता है जबकि 'काले' को काला कम और 'काला-कलूटा' ज्यादा संबोधित किया जाता है.
आप कितना ही इनकार कर लें, किसी श्याम वर्णीय स्त्री या पुरुष को देखते ही हमारे मन में संशय का सागर हिलोरे लेने लगता है. कारण! काला तो है ही, पता नहीं कितना सच्चा होगा? कहीं चोर न हो?
ऐसे विचार रह रह कर उमड़ने घुमड़ने लगते हैं. काली लड़कियां कितनी भी गुणवान क्यों न हों, विवाह के लिए बहुत प्रतीक्षा करती हैं जबकि गोरी लड़कियों के रिश्ते पहले ही आने लगते हैं.
समानता पर भाषण देने वालों को समाज के इस पक्ष के प्रति भी जागरूक होना पड़ेगा.

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