Tuesday, April 26, 2016

अतिथि दूरो भवः

शंघाई के हवाई अड्डे पर एक महीने में जितने लोग चढ़ते उतरते हैं उतने  भारत के सभी  हवाई  अड्डों पर वर्ष भर में भी यात्री नहीं होते. ये छोटा सा उदाहरण ये बताने के लिए काफी है कि विश्वभर में भारत आने वाले लोगों की संख्या कितनी है.
आपके ज्ञान के लिए बता दूँ कि विश्व में १९६ कुल देश हैं और विश्व के सात आश्चर्य में से एक 'ताजमहल' भारत में है. तो इस हिसाब से भारत २८ में से १ देश बैठता है जहाँ पर्यटक आने चाहियें. पर भारत आने वालों की संख्या देख कर बिलकुल भी नहीं लगता कि ताजमहल, लाल किला, खजुराहो, अजंता, एलीफैन्टा या कोई भी और भारतीय पर्यटक स्थल विश्व को इतना आकर्षित कर पाता है जबकि विश्व के कई देश तो केवल अपने पर्यटन प्रबंधन और प्रचार कौशल के कारण ही विश्व भर से पर्यटकों को वहाँ बुलाने और उनसे मुद्रा कमाने में अग्रणी हैं. जरा मलेशिया और ब्राजील को देखिये!
फिर हमारे यहाँ पर्यटक आये भी कैसे? अभी ऊपर जिस ताजमहल का मैंने जिक्र किया, उसका 'गृह नगर' यानि आगरा देखिएगा कभी जाकर. बेतरतीब रूप से विकसित, कूड़े के ढेर और गली मोहल्लों में उग रहे अनाप शनाप उद्योगों का शहर है आगरा. जरा सोचिये, जो शहर विश्व के सात आश्चर्यों में से एक को अपनी गोद में लिए हो, उसकी ऐसी हालत होनी चाहिए?
उसके बाद हमारा विदेशियों के प्रति व्यवहार. हम तो उन्हें ऐसे निहारते हैं मानो वो विदेश से नहीं, मंगल ग्रह से आये हों. कोशिश यही रहती है कि कदम कदम पर उन्हें जी भर कर लूट सकें. एक अजीब तरह से उनसे नजरें चिपका लेते हैं हम और मैंने देखा है कि वो ऐसे में बड़ा असहज महसूस करते हैं.
पर्यटन विभाग ने भी ऐसा कोई पुख्ता इंतजाम नहीं कर रखा कि भारत आने वाला पर्यटक रहने, घूमने, खाने पीने और खरीदारी करने में न तो असहज महसूस करे और न ही लुटा पिटा . शायद यही कारण है कि इतनी सारी पौराणिक विरासत होते हुए भी पर्यटकों के मामले में हम खाली हाथ ही हैं.
हमें अपने पर्यटन स्थल बेहतर बनाने होंगे, प्रबंधन को बेहतर करना होगा और सबसे बढ़कर, खुद को सुधारना होगा.
वरना 'अतिथि देवो भवः' के सूक्ति वाक्य पर चलने वाले इस भारत से देव दूर रहना ही पसंद करेंगे.



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