Wednesday, April 27, 2016

सावधान! आदमी काम पर हैं

आपने अपने शहर में कोई पुल  या  सड़क  बनती  देखी  है  कभी? आपने  नोटिस  किया  होगा  कि  इनके  शुरू होने  और बनने  में  कितना अधिक समय लग जाता है. आप उस  साइन बोर्ड  का  आकार प्रकार ,रंग रूप और हर कोना याद  कर  चुके होते हैं  जिस पर लिखा होता  है-
आदमी काम पर हैं. असुविधा के लिए खेद है.
अब ये असुविधा इतनी लंबी क्यों खींच गई? जब आदमी काम पर हैं तो भला काम खत्म होने पर क्यों नहीं आ रहा? आपको शायद  पता  ही  होगा कि  इस  बीच उस  पुल या  सड़क की लागत करीब दोगुनी हो  जाती है
और ये लागत हमारी और आपकी जेब से ही पूरी होती है.
दरअसल लेटलतीफी हमारी मानों रगों में बस गई है. सरकारी निर्माणों की बात तो छोड़ ही दीजिए, हमारे दैनिक जीवन में भी हम कभी दिल से ये कोशिश नहीं करते कि हम न केवल समय के साथ चलें बल्कि समय से एक हाथ आगे रहें. शादी या किसी समारोह में जाना है तो कार्ड में छपे समय से एक घंटा बाद ही पहुंचेंगे, कार्ड छपवाने वाला भी उसी हिसाब से समय डलवाता है. अगर ऑफिस में सख्ती नहीं है तो भले ही पाँच मिनट लेट हों, समय पर ऑफिस पहुँचने का सवाल ही नहीं बनता.
भारतीय रेलगाडियां भी इसका अपवाद नहीं हैं. २४ घंटे तक देर से चलने वाली गाड़ियां तो पहले ही लेट होने का रिकॉर्ड लेकर चलती हैं, ऊपर से जब देर से चलने वाली इन गाड़ियों में लोगों को चलती ट्रेन में भाग कर चढ़ते देखा जाता है तो लगता है कि ये लोग ट्रेन से क्या लेट होने की प्रतियोगिता कर रहे थे?
कोई स्कूल ऐसा शायद ही देखने को मिलेगा जहाँ तय समय के बाद भी १५-२० बच्चे गेट के बाहर लेट आने के बहाने लिए खड़े होंगे.
तो लेट होना हमारी  आदत नहीं हमारी 'लत' बन चुकी है. अच्छा है कि हम समय रहते इसे त्याग दें और अगर संभव हो तो सरकार की उस मशीनरी के खिलाफ भी आवाज उठायें जो हमारे देश के विकास को पीछे धक्का दे रही है. कोई पुल, कोई सड़क, कोई भवन या कोई भी योजना अपने समय पर पूरी होनी चाहिए वरना उसका खर्चा बढ़ जाता है और उसकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है.
पर जब तक हम जागते नहीं, आप अपने इस 'अधिकार' के सम्बन्ध में सोच पायेंगे क्या?



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