भारत के बहुत से राज्यों में इस समय सूखा पड़ रहा है. कई जगह लोगों को पानी के लिए मीलों चल कर जाना पड़ रहा है तो कई जगह पेट्रोल के भाव पर पानी खरीदना पड़ रहा है. ऐसे में इन राज्यों की सरकार अपने राज्यवासियों के बीच जनजागरूकता अभियान छेड़े हुए हैं जिसके द्वारा लोगों को पानी की बर्बादी रोकने, अधिकाधिक पानी बचाने और सार्वजानिक जल भंडारों की रक्षा करने का सन्देश दिया जा रहा है.
ऐसे कई जागरूकता अभियान मैंने अपने जीवन में देखे हैं. उनमे से कई तो ऐसे ही चलते हैं जैसे ऊपर दिया गया उदाहरण यानि जब आग लगे तब कुआँ खोदो. सत्य तो ये है कि अगर ये उपाय पहले ही अपना लिए गए होते तो शायद आज इस अभियान की आवश्यकता ही नहीं होती.
इसी तरह वृक्ष लगाओ अभियान, सफाई अभियान, ट्रैफिक जागरण, स्त्री सम्मान सप्ताह और पता नहीं कितने जागरूकता अभियान चलाये जाते हैं. मेरा ये कहना नहीं कि ये अभियान सफल नहीं होते या इनका कोई भी महत्व नहीं है किन्तु अधिकांशतः अभियान जागरूकता अभियान की जगह 'जाग कर रुक गए' अभियान बन कर रह जाते हैं. इसीका परिणाम है कि अभी तक हमने महिलाओं का सम्मान करना नहीं सीखा, सड़क पर चलने की तमीज नहीं सीखी और पेड़ों के महत्व को भी हम तभी समझ पाते हैं जब हमें अपना वहाँ उनकी छाया के नीचे खड़ा करना होता है. कुछ उदाहरण तो ऐसे हैं जहाँ जनता ने किये कराये को बदतर हालत में पहुंचा दिया जैसे पेड़ लगवा दिये गए पर उनका किसी ने ध्यान नहीं रखा. शौचालय बने रहे और लोग खेतों में शौच करते रहे. ट्रैफिक लाईट की ओर आँख उठा कर भी नहीं देखा और अपनी राह चलते रहे.
कहा गया है-'जब जागो, तब सवेरा'. बिलकुल ठीक बात है पर इस हिसाब से जब सो जाओ तब रात भी तो है. इसलिए, जागे ही हैं तो जागे रहिये. हर अभियान के बात हम और आप यूँ ही उसकी उपेक्षा कर देंगे तो भारत आगे कैसे बढ़ेगा? मैंने पहले भी जिक्र किया है कि ये सब तो भारत को बेहतर बनाने के लिए हमारे जीवन का हिस्सा होना चाहिए और इनमे से कई के लिए तो अभियान चलाने जैसा कुछ होना भी नहीं चाहिए. ये भावना तो हमारे ह्रदय में पहले से वास करनी चाहिए.
लगता है इन अभियानों की सफलता सुनिश्चित करने के लिए भी एक 'महा जागरूकता अभियान' चलाना पड़ेगा.
ऐसे कई जागरूकता अभियान मैंने अपने जीवन में देखे हैं. उनमे से कई तो ऐसे ही चलते हैं जैसे ऊपर दिया गया उदाहरण यानि जब आग लगे तब कुआँ खोदो. सत्य तो ये है कि अगर ये उपाय पहले ही अपना लिए गए होते तो शायद आज इस अभियान की आवश्यकता ही नहीं होती.इसी तरह वृक्ष लगाओ अभियान, सफाई अभियान, ट्रैफिक जागरण, स्त्री सम्मान सप्ताह और पता नहीं कितने जागरूकता अभियान चलाये जाते हैं. मेरा ये कहना नहीं कि ये अभियान सफल नहीं होते या इनका कोई भी महत्व नहीं है किन्तु अधिकांशतः अभियान जागरूकता अभियान की जगह 'जाग कर रुक गए' अभियान बन कर रह जाते हैं. इसीका परिणाम है कि अभी तक हमने महिलाओं का सम्मान करना नहीं सीखा, सड़क पर चलने की तमीज नहीं सीखी और पेड़ों के महत्व को भी हम तभी समझ पाते हैं जब हमें अपना वहाँ उनकी छाया के नीचे खड़ा करना होता है. कुछ उदाहरण तो ऐसे हैं जहाँ जनता ने किये कराये को बदतर हालत में पहुंचा दिया जैसे पेड़ लगवा दिये गए पर उनका किसी ने ध्यान नहीं रखा. शौचालय बने रहे और लोग खेतों में शौच करते रहे. ट्रैफिक लाईट की ओर आँख उठा कर भी नहीं देखा और अपनी राह चलते रहे.
कहा गया है-'जब जागो, तब सवेरा'. बिलकुल ठीक बात है पर इस हिसाब से जब सो जाओ तब रात भी तो है. इसलिए, जागे ही हैं तो जागे रहिये. हर अभियान के बात हम और आप यूँ ही उसकी उपेक्षा कर देंगे तो भारत आगे कैसे बढ़ेगा? मैंने पहले भी जिक्र किया है कि ये सब तो भारत को बेहतर बनाने के लिए हमारे जीवन का हिस्सा होना चाहिए और इनमे से कई के लिए तो अभियान चलाने जैसा कुछ होना भी नहीं चाहिए. ये भावना तो हमारे ह्रदय में पहले से वास करनी चाहिए.
लगता है इन अभियानों की सफलता सुनिश्चित करने के लिए भी एक 'महा जागरूकता अभियान' चलाना पड़ेगा.


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