भारतीय नारियों का अगर कहीं सम्मान है तो वो शायद सबसे ज्यादा किताबों में ही है. वास्तविकता तो ये है कि कम से कम भारत में अधिकांश नारियाँ अपना हक या तो नहीं पा रही हैं या फिर नहीं के बराबर पा रही हैं. इसका प्रमाण देखना है तो आज भी भारतीय चैनलों पर चलने वाले टेलीविजन धारावाहिक देख लीजिए, आपको मेरी बात का अर्थ समझ में आ जाएगा. इन धारावाहिकों में आज भी स्त्री परपुरुषों की दया पर निर्भर दिखाई जाती है और ये सब कोई बहुत झूठ नहीं.
आज भी 'लड़के वालों' की गर्दन यूँ तनी होती है मानो वो हीरे की खान लिए घूम रहे हों. लड़का कैसा भी हो, लड़की हूर की परी ही चाहिए. दहेज के भी नए नए रूप सामने आ रहे हैं. लड़कियां काबिल होती जा रही हैं और अच्छी नौकरियां पाने लगी हैं तो एक नौकरीशुदा लड़की से शादी करने का अर्थ ये हुआ कि जिंदगी भर का दहेज.
इसके बाद भी रोज उत्पीड़न और बलात्कार के मामलों में बढ़ोत्तरी होती जा रही है. स्थिति ये है कि जो लोग स्त्रियों को उनका यथोचित अधिकार दे रहे हैं वो भी ये मान कर चलते हैं कि वो उन पर एहसान कर रहे हैं.
ऊपर से तस्वीर बहुत बदली नज़र आती है. काम करने वाली स्त्रियां, कारों में घूमने वाली स्त्रियां,ऊँचे पदों पर काम करने वाली स्त्रियां, पर अंदर झाँक कर देखो तो हालत ये है कि बड़ी हस्ती मानी जाने वाली स्त्रियां भी जब मुहँ खोलती हैं तो पता लगता है कि अब तक वो कितना दंश झेल रही थीं.
कारण? कारण है हमारी पुरुष मानसिकता. ये कोई एक दिन की बात नहीं, हज़ारों वर्षों तक हम ऐसा करते आये हैं. ये हमारे समाज के पुरुषों के मष्तिष्क में 'जीन' के रूप में विकसित हो चुका है.
अब आवश्यकता है इस जीन को खत्म करने की. समय लगेगा पर मुझे विश्वास है परिणाम दिखेंगे. फिर लड़कियों के नाम थानों में होंगे लेकिन एफ.आई.आर. में पीड़िता के रूप में नहीं, वहाँ के दरोगा के रूप में. धारावाहिकों में वो एक पात्र होंगी, शिकार नहीं. जब उन्हें उनका वाज़िब हक मिल रहा होगा और वो कभी भी किसी प्रकार से किसी पुरुष की कृपा नहीं होगी.
मुझे विश्वास है.
आज भी 'लड़के वालों' की गर्दन यूँ तनी होती है मानो वो हीरे की खान लिए घूम रहे हों. लड़का कैसा भी हो, लड़की हूर की परी ही चाहिए. दहेज के भी नए नए रूप सामने आ रहे हैं. लड़कियां काबिल होती जा रही हैं और अच्छी नौकरियां पाने लगी हैं तो एक नौकरीशुदा लड़की से शादी करने का अर्थ ये हुआ कि जिंदगी भर का दहेज.
इसके बाद भी रोज उत्पीड़न और बलात्कार के मामलों में बढ़ोत्तरी होती जा रही है. स्थिति ये है कि जो लोग स्त्रियों को उनका यथोचित अधिकार दे रहे हैं वो भी ये मान कर चलते हैं कि वो उन पर एहसान कर रहे हैं.
ऊपर से तस्वीर बहुत बदली नज़र आती है. काम करने वाली स्त्रियां, कारों में घूमने वाली स्त्रियां,ऊँचे पदों पर काम करने वाली स्त्रियां, पर अंदर झाँक कर देखो तो हालत ये है कि बड़ी हस्ती मानी जाने वाली स्त्रियां भी जब मुहँ खोलती हैं तो पता लगता है कि अब तक वो कितना दंश झेल रही थीं.
कारण? कारण है हमारी पुरुष मानसिकता. ये कोई एक दिन की बात नहीं, हज़ारों वर्षों तक हम ऐसा करते आये हैं. ये हमारे समाज के पुरुषों के मष्तिष्क में 'जीन' के रूप में विकसित हो चुका है.
अब आवश्यकता है इस जीन को खत्म करने की. समय लगेगा पर मुझे विश्वास है परिणाम दिखेंगे. फिर लड़कियों के नाम थानों में होंगे लेकिन एफ.आई.आर. में पीड़िता के रूप में नहीं, वहाँ के दरोगा के रूप में. धारावाहिकों में वो एक पात्र होंगी, शिकार नहीं. जब उन्हें उनका वाज़िब हक मिल रहा होगा और वो कभी भी किसी प्रकार से किसी पुरुष की कृपा नहीं होगी.
मुझे विश्वास है.

Nice view.
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