भ्रष्टाचार को बहुत सी उपमाएं दी गई हैं. कभी इस दीमक कहा जाता है तो कभी घुन तो कभी कीड़ा जो समाज को खोखला कर रहा है पर मेरी दृष्टि में भ्रष्टाचार कम से कम भारत में तो एक विषबेल की तरह ही है. घुन और दीमक वगैरा दिखाई नहीं पड़ते पर ये तो प्रत्यक्ष है. हर जगह उपस्थित.
वैसे तो भारत में भ्रष्टाचार इतना है कि हर सरकारी महकमे के एक हिस्से के भ्रष्टाचार पर भी ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं किन्तु यहाँ हम भ्रष्टाचार के उस रूप पर दृष्टि डालते हैं जिसे देखते समझते हुए भी हमें कड़वा घूँट पीना पड़ता है.
उदाहरण के लिए मिस्टर बत्रा को अपना मकान बनवाना है. उनका नक्शा भी पास हो चुका है लेकिन मकान बनना शुरू होते ही नगर निगम के दो अफसर आकार उसमे कितने ही कानूनी पेंच निकाल देते हैं और उसका निर्माण रुकवा देते हैं. अब बत्रा साहब क्या करें? उनको पैसे न दें तो मकान की लागत बढ़ती जायेगी. उनका दूसरी जगह रहने का खर्चा भी अधिक हो जाएगा.
तो ये सोचकर वो पैसे दे देते हैं कि 'चलो सौदा घाटे का नहीं'.
ऐसे कितने ही उदाहरण आपको मिल जायेंगे जब लोग 'चलो छोडो' वाले अंदाज में इसे बढ़ावा दे देते हैं. कुछ मजबूरियां, कुछ पैसे की धसक और कुछ जल्दी काम करवाने का फलसफा.
और फिर बच कर जाएँ तो जाएँ कहाँ?
पुलिस से शिकायत करो तो रिपोर्ट लिखवाने को रिश्वत. उपर का अधिकारी तो मिलने के भी पैसे लेगा. न्यायालय में मुंशी तारीख डालने को रिश्वत और हो सकता है, जज भी 'चाय पानी' मांग ले.
इससे अच्छा पहले स्तर पर ही निपटाओ.
वैसे तो भारत में भ्रष्टाचार इतना है कि हर सरकारी महकमे के एक हिस्से के भ्रष्टाचार पर भी ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं किन्तु यहाँ हम भ्रष्टाचार के उस रूप पर दृष्टि डालते हैं जिसे देखते समझते हुए भी हमें कड़वा घूँट पीना पड़ता है.
उदाहरण के लिए मिस्टर बत्रा को अपना मकान बनवाना है. उनका नक्शा भी पास हो चुका है लेकिन मकान बनना शुरू होते ही नगर निगम के दो अफसर आकार उसमे कितने ही कानूनी पेंच निकाल देते हैं और उसका निर्माण रुकवा देते हैं. अब बत्रा साहब क्या करें? उनको पैसे न दें तो मकान की लागत बढ़ती जायेगी. उनका दूसरी जगह रहने का खर्चा भी अधिक हो जाएगा.
तो ये सोचकर वो पैसे दे देते हैं कि 'चलो सौदा घाटे का नहीं'.
ऐसे कितने ही उदाहरण आपको मिल जायेंगे जब लोग 'चलो छोडो' वाले अंदाज में इसे बढ़ावा दे देते हैं. कुछ मजबूरियां, कुछ पैसे की धसक और कुछ जल्दी काम करवाने का फलसफा.
और फिर बच कर जाएँ तो जाएँ कहाँ?
पुलिस से शिकायत करो तो रिपोर्ट लिखवाने को रिश्वत. उपर का अधिकारी तो मिलने के भी पैसे लेगा. न्यायालय में मुंशी तारीख डालने को रिश्वत और हो सकता है, जज भी 'चाय पानी' मांग ले.
इससे अच्छा पहले स्तर पर ही निपटाओ.

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