Wednesday, April 6, 2016

भारतीयों की विदेशी प्रेरणा

भारत पर विदेशियों के राज करने का इतिहास बहुत लंबा रहा है. मुगलों और अंग्रेजों ने तो भारत को अपनी दुधारू गाय ही बना रखा था. अब, जबकि हम आज़ाद हो चुके हैं, मुझे लगता है हमारा मस्तिष्क अभी भी उनका बंधक ही है. हमारी भाषा, हमारा पहनावा और चाल चलन बहुत हद तक विश्व के विकसित राष्ट्रों की भद्दी नक़ल करता दिखाई देता है.
मेरा ये कहना बिलकुल नहीं है कि हम 'हमारी संस्कृति और परंपरा' के नाम पर रूढ़िवाद, ढोंग और अंधविश्वासों को बढ़ावा दें. पर जिस विषय में हम बेहतर हैं, कम से कम उसे तो बेहतरीन करें.
यहाँ पर मेरी तरफ से दो उदाहरण प्रस्तुत हैं-
१-भाषा-
मेरे विचार से हिंदी और संस्कृत एक स्वतः समृद्ध और एक लगभग सम्पूर्ण भाषा है. हिंदी में बहुत से उन शब्दों को लिखा जा सकता है जिन्हें दूसरी भाषा में आसानी से लिखना संभव नहीं है. इसका व्याकरण बहुत समृद्ध है और जो बोला जाता है वही लिखा जाता है. पता नहीं हम अंग्रेजी के पीछे इतना हाथ धोकर क्यों पड़े हैं जबकि हिंदी में सभी कार्य कहीं बेहतर तरीके से सम्पादित किये जा सकते हैं. अगर कोई कहता है कि अंग्रेजी एक वैश्विक भाषा है तो उसे चीन का उदाहरण देखना होगा जहाँ अंग्रेजी को कोई प्राथमिकता नहीं दी जाती और फिर भी दुनिया भर में उसका डंका बजता है. सही बात तो ये है कि स्वयं को बेहतर बनाइये और वो भी इतना कि दूसरे आपका अनुसरण करें.
२-संगीत-
भारतीय शास्त्रीय संगीत यूँ समझिए कि विश्व भर के संगीत का व्याकरण है. हमारे वाद्य, हमारी सुर ताल की समझ और संगीत के प्रति हमारा पारंपरिक अनुराग विश्व में सर्वोपरी है. मुझे आश्चर्य होता है जब हमारे युवा बेसुरे, कानफाडू संगीत पर झूमते हैं. उस संगीत को सुनने का अर्थ है कि वो 'आधुनिक' हो गए हैं- बस यही सोच उन्हें हमारे शानदार भारतीय संगीत का रसास्वादन नहीं करने देती.
समृद्ध विदेशी शहरों और वहाँ रहने वाले लोगों को देख कर हम आहें भरते हैं पर ये नहीं जानते कि वो लोग अपने देश के लिए कितने प्रतिबद्ध होते हैं. खुलेआम प्रेम प्रदर्शन हमें रोमांचित करता है पर वो लोग इस विषय में दिल से भी स्वतंत्र हैं. कहने का अर्थ है कि भाई को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता  कि उसकी बहन का प्रेम प्रसंग किसके साथ है यहाँ तक कि माँ का भी. क्या हम अपने दिलों में इतनी जगह बना पाए हैं?
फिलहाल तो हम उन वस्तुओं को भी विदेश से मांगा कर खुश हैं जो भारत में कहीं अच्छी और सस्ती उपलब्ध हो सकती हैं.
तो क्या आपने पिछली बार मैक डी का बर्गर खाया था? शायद उतने ही पैसे में आपके पूरे परिवार का पेट भर सकता था?
पर कई लोगों ने तो उनके रास्ते में पड़ने वाला 'मंगल ढाबा' देखा ही नहीं .

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