भारत एक लोकतान्त्रिक देश है. लोकतंत्र भी ऐसा वैसा नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र. हम भारतीय अपना नेता खुद चुन सकते हैं और उसकी मनमानी के खिलाफ आवाज़ उठा सकते हैं. भारत का संविधान कहता है कि 'जनता की सरकार, जनता के द्वारा'.
पर क्या वास्तव में ऐसा है?
हम चुनते जरुर हैं पर हमारे मनोमस्तिष्क पहले ही तैयार कर दिये जाते हैं कि हमे किसे चुनना है. चुनाव से पहले हमें हमारा धर्म, क्षेत्र और जाति सब याद दिला दी जाती है.
कहने को लोकतंत्र है पर ये दिखाई देता है केवल चुनाव से कुछ समय पहले जब हमारे नेता हमारे बीच हाथ जोड़े खड़े होते हैं. यूँ तो हम उन्हें जब चाहे हटा सकते हैं पर पहले तो हम आगे ही नहीं आते और अगर ये अतिशयोक्ति हो भी जाए तो हमें पता चलता है कि एक तानाशाह को हटा कर हमने दूसरा बैठा दिया है. अगर ये नेता जनता की सेवा वास्तव में ही करना चाहते तो क्यों चुनावों के समय धांधली होती, मतपत्र लूटे जाते और भला क्यों ये आपस में लड़ते? भई, सेवा ही तो करनी है, कोई भी कर ले. सत्य तो ये है कि इन्हें अपनी और अपने परिवार की जीवें भरनी हैं और हो सकता है इन्हें इसके लिए केवल ५ वर्ष ही मिलें.
और ५ वर्ष के बाद? फिर हमारी 'सेवा' करने के लिए एक नया नेता आ खड़ा होता है जिसकी सोच ठीक यही होती है. सभी ऐसे नहीं हैं पर अगर कुछ सच्चे हैं तो वो समाज पर कोई खास फर्क नहीं डाल सकते.
मेरा मानना है कि चुनावी घोषणापत्र केवल वादे न होकर एक शर्त होनी चाहिए. पहले तो सबसे पूछा जाना चाहिए कि आप ये वादे कैसे पूरे करेंगे और चुनाव के बाद अगर कोई ऐसा न कर पाए तो उसे जनता को ठगने के जुर्म में जेल में डाल देना चाहिए.
लेकिन फिर वही बात !......जेल में डालेगा कौन? यहाँ तो जेल में बैठे लोगों की मिजाजपुर्सी करने के लिए भी अच्छा 'जनतंत्र' होता है.
पर क्या वास्तव में ऐसा है?
हम चुनते जरुर हैं पर हमारे मनोमस्तिष्क पहले ही तैयार कर दिये जाते हैं कि हमे किसे चुनना है. चुनाव से पहले हमें हमारा धर्म, क्षेत्र और जाति सब याद दिला दी जाती है.
कहने को लोकतंत्र है पर ये दिखाई देता है केवल चुनाव से कुछ समय पहले जब हमारे नेता हमारे बीच हाथ जोड़े खड़े होते हैं. यूँ तो हम उन्हें जब चाहे हटा सकते हैं पर पहले तो हम आगे ही नहीं आते और अगर ये अतिशयोक्ति हो भी जाए तो हमें पता चलता है कि एक तानाशाह को हटा कर हमने दूसरा बैठा दिया है. अगर ये नेता जनता की सेवा वास्तव में ही करना चाहते तो क्यों चुनावों के समय धांधली होती, मतपत्र लूटे जाते और भला क्यों ये आपस में लड़ते? भई, सेवा ही तो करनी है, कोई भी कर ले. सत्य तो ये है कि इन्हें अपनी और अपने परिवार की जीवें भरनी हैं और हो सकता है इन्हें इसके लिए केवल ५ वर्ष ही मिलें.
और ५ वर्ष के बाद? फिर हमारी 'सेवा' करने के लिए एक नया नेता आ खड़ा होता है जिसकी सोच ठीक यही होती है. सभी ऐसे नहीं हैं पर अगर कुछ सच्चे हैं तो वो समाज पर कोई खास फर्क नहीं डाल सकते.
मेरा मानना है कि चुनावी घोषणापत्र केवल वादे न होकर एक शर्त होनी चाहिए. पहले तो सबसे पूछा जाना चाहिए कि आप ये वादे कैसे पूरे करेंगे और चुनाव के बाद अगर कोई ऐसा न कर पाए तो उसे जनता को ठगने के जुर्म में जेल में डाल देना चाहिए.
लेकिन फिर वही बात !......जेल में डालेगा कौन? यहाँ तो जेल में बैठे लोगों की मिजाजपुर्सी करने के लिए भी अच्छा 'जनतंत्र' होता है.

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