समाज विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों का समूह होता है.इनमे अधिकांश साधारण जन होते हैं, कुछ विशेष होते हैं, कुछ अति विशेष और कुछ वास्तव में महान. यहाँ 'महापुरुष' कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि ये उपाधि स्त्री को भी प्रदत्त की जा सकती है.
भारतीय समाज भी इसका अपवाद नहीं रहा है. हमारे देश में बहुत से महान लोगों को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगा कर या फिर जान देकर भी भारत का मस्तक विश्व भर में ऊँचा किया है. भारतीय समाज से कई कुरीतियों को मिटाने और नव जागरण जगाने में इनका बहुत योगदान रहा है. ऐसा भी नहीं है कि आज ये परम्परा खत्म हो गई है. आज भी समाज का उत्थान करने के लिए लोग आगे आते हैं और वास्तव में परोपकार में लगे रहते हैं.
अब जरा भारत के वर्तमान सन्दर्भ में इसकी बात करते हैं. हमारे राजनीतिज्ञ इन महान विभूतियों को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करते हैं. किस महान विभूति का कहाँ पर किस प्रकार उपयोग किया जाए, ये इनके वोट बैंक पर निर्भर करता है. उस विभूति का चुनाव भी इसी आधार पर होता है. कहने का अर्थ ये है कि इन्हें ये प्रेरणा का श्रोत नजर आते हैं मगर केवल लोगों को लुभाने के लिए. उनके आदर्शों, उनके कार्यों, उनके बलिदानों से इनका दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं.
जनता को समझना होगा कि महान विभूतियाँ किसी की बपौती नहीं. हमें भरमाने और उपयोग करने की तो बिलकुल नहीं.
क्योंकि महानता समाज की विरासत होती है.
भारतीय समाज भी इसका अपवाद नहीं रहा है. हमारे देश में बहुत से महान लोगों को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगा कर या फिर जान देकर भी भारत का मस्तक विश्व भर में ऊँचा किया है. भारतीय समाज से कई कुरीतियों को मिटाने और नव जागरण जगाने में इनका बहुत योगदान रहा है. ऐसा भी नहीं है कि आज ये परम्परा खत्म हो गई है. आज भी समाज का उत्थान करने के लिए लोग आगे आते हैं और वास्तव में परोपकार में लगे रहते हैं.
अब जरा भारत के वर्तमान सन्दर्भ में इसकी बात करते हैं. हमारे राजनीतिज्ञ इन महान विभूतियों को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करते हैं. किस महान विभूति का कहाँ पर किस प्रकार उपयोग किया जाए, ये इनके वोट बैंक पर निर्भर करता है. उस विभूति का चुनाव भी इसी आधार पर होता है. कहने का अर्थ ये है कि इन्हें ये प्रेरणा का श्रोत नजर आते हैं मगर केवल लोगों को लुभाने के लिए. उनके आदर्शों, उनके कार्यों, उनके बलिदानों से इनका दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं.
जनता को समझना होगा कि महान विभूतियाँ किसी की बपौती नहीं. हमें भरमाने और उपयोग करने की तो बिलकुल नहीं.
क्योंकि महानता समाज की विरासत होती है.

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