कुछ ऐसी ही एक पोस्ट मैंने कुछ दिनों पहले की थी जिसमे मैंने ये बताने की कोशिश की थी कि भारतीय माता पिता आज भी वही पुराने अवसरों जैसे, डॉक्टर, इंजिनियर और प्रशासनिक अधिकारी बनाने के लिए अपने बच्चों को प्रेरित कर रहे हैं जबकि इस वैश्विक युग की सच्चाई ये है कि पता नहीं कितने रोजगार के ऐसे और अवसर शुरू हो चुके हैं जो उपरोक्त अवसरों से कई गुना बेहतर हैं.आज मुझे फिर इसी विषय पर लिखने को मजबूर होना पड़ा जब मैंने अखबार में खबर पढ़ी कि राजस्थान के कोटा शहर के कोचिंग संस्थान के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली. कोटा में अब तक बहुत से छात्र छात्रा आत्महत्या कर चुके हैं और अधिकतर के सुसाइड नोट बताते हैं कि उन्होंने माता-पिता की अपेक्षाएं न पूरी कर पाने के दुःख में दुनिया से ही किनारा कर लिया.
ये अपेक्षाएं तो दरअसल तभी से देखी जा सकती हैं जब से बच्चा स्कूल में दाखिला लेता है. 'कक्षा में अंकों के आधार पर बच्चे का कौन सा स्थान है'- ये प्रश्न माता पिता को इतना विचलित किये रहता है कि लगता है अगर मौका दिया जाए तो बच्चे के स्थान पर वो स्वयं परीक्षा देने न आ जाएँ. अगर आप भी माता पिता है और अपने बच्चे का अंकपत्र लेने उसके स्कूल गए हैं तो कुछ देर वहाँ रुकिए और आप पायेंगे कि अधिकाँश माता पिता बस उनका बच्चा अधिक से अधिक अंक कैसे लाये को लेकर ही बहुत चिंतित हैं. कोई नहीं पूछता कि मेरा बच्चा खेल में कैसा है, तर्क वितर्क या गीत संगीत में रूचि तो दूर की बात है. बच्चा होशियार है या नहीं- अरे ये भी कोई पूछने की बात है! उसका अंकपत्र देख लो, पता लग जाएगा. मतलब कि अंकपत्र तो बच्चे के दिमाग के मीटर की रीडिंग है. जितने ज्यादा अंक, उतना होशियार बच्चा.माता पिता होना एक सुखद अनुभव होता है और बच्चों की परवरिश कोई आसान नहीं होती. बिना अपेक्षा के दुनिया में बहुत कम कार्य ही किये जाते हैं और अगर कोई माता पिता अपने बच्चे से कुछ अपेक्षा करते हैं तो वो किसी भी प्रकार से गलत नहीं है.
लेकिन....
१-ये 'कुछ' कुछ न रह कर 'सब कुछ' बन जाता है.
२-हर जगह कुछ अतिरिक्त प्रतिभावान बच्चे होते हैं. उनसे अपने बच्चे की तुलना उसका मनोबल गिराना ही है.
३-बच्चे किसी न किसी क्षेत्र में अवश्य बेहतर होंगे. उनकी वो प्रतिभा ढूँढ निकालें.
४-आपकी अपेक्षाएं वो ऊर्जा होनी चाहियें जो उसे ऊपर जाने को प्रेरित करें न कि पत्थर जो उसे डर के मारे आगे ही न बढ़ने दें.
चलिए आपसे कुछ प्रश्न करते हैं -
१-आप हर वर्ष टॉपर्स की लिस्ट अखबार में देखते हैं. क्या आपको पिछले टॉपर्स का नाम याद है?
२-आपने कभी भी किस ऊँची नौकरी करने वाले मशहूर व्यक्ति के बारे में ये सुना है कि ये अपने जिले छोडो, स्कूल का भी बेहतरीन छात्र या छात्रा रहा हो.
३-इतिहास से ऐसे दस नाम ढूँढ कर निकालिए जो अपनी शिक्षा के कारण मशहूर हुए हों.
४-क्या आप स्वयं वही बनने के सपने देखते थे जो आज आप अपनी संतान को बनाना चाहते हैं?उम्मीद है आप समझ गए होंगे कि आप दरअसल बच्चे को आगे बढ़ना देखना चाहने के बहाने उस पर वो इच्छाएं थोप रहे हैं जो आपके मन में रह गईं. इस तरह से बच्चा उस दिशा में भी कुछ नहीं कर पा रहा जहाँ वो कर सकता है और आपकी दिखाई गई राह पहले ही उसके लिए दुष्कर है.
तो अब मेरा अनुरोध है.बच्चे को स्वयं विकसित होने दें, उसकी पसंद और नापसंद पर नजर रखें. उसे उसी दिशा में प्रोत्साहन दें जिस दिशा में उसका रुझान है. विशवास कीजिये, आज हर क्षेत्र में बहुत अवसर हैं.
और एक भरोसा और रखें-
'आपका बच्चा पड़ोसी और मोहल्ले का ही नहीं, शहर का सबसे बेहतरीन बच्चा है. और भारत का भी.'





















