Sunday, May 8, 2016

जान लेती अपेक्षाएं

कुछ ऐसी ही एक पोस्ट मैंने कुछ दिनों पहले की थी जिसमे मैंने ये बताने की कोशिश की थी कि भारतीय माता पिता आज भी वही पुराने अवसरों जैसे, डॉक्टर, इंजिनियर और प्रशासनिक अधिकारी बनाने के लिए अपने बच्चों को प्रेरित कर रहे हैं जबकि इस वैश्विक युग की सच्चाई ये है कि पता नहीं कितने रोजगार के ऐसे और अवसर शुरू हो चुके हैं जो  उपरोक्त अवसरों से कई गुना बेहतर हैं.
आज मुझे फिर इसी विषय पर लिखने को मजबूर होना पड़ा जब मैंने अखबार में खबर पढ़ी कि राजस्थान के कोटा शहर के कोचिंग संस्थान के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली. कोटा में अब तक बहुत से छात्र छात्रा आत्महत्या कर चुके हैं और अधिकतर के सुसाइड नोट बताते हैं कि उन्होंने माता-पिता की अपेक्षाएं न पूरी कर पाने के दुःख में दुनिया से ही किनारा कर लिया.
ये अपेक्षाएं तो दरअसल तभी से देखी जा सकती हैं जब से बच्चा स्कूल में दाखिला लेता है. 'कक्षा में अंकों के आधार पर बच्चे का कौन सा स्थान है'- ये प्रश्न माता पिता को इतना विचलित किये रहता है कि लगता है अगर मौका दिया जाए तो बच्चे के स्थान पर वो स्वयं परीक्षा देने न आ जाएँ. अगर आप भी माता पिता है और अपने बच्चे का अंकपत्र लेने उसके स्कूल गए हैं तो कुछ देर वहाँ रुकिए और आप पायेंगे कि अधिकाँश माता पिता बस उनका बच्चा अधिक से अधिक अंक कैसे लाये को लेकर ही बहुत चिंतित हैं. कोई नहीं पूछता कि मेरा बच्चा खेल में कैसा है, तर्क वितर्क या गीत संगीत में रूचि तो दूर की बात है. बच्चा होशियार है या नहीं- अरे ये भी कोई पूछने की बात है! उसका अंकपत्र देख लो, पता लग जाएगा. मतलब कि अंकपत्र तो बच्चे के दिमाग के मीटर की रीडिंग है. जितने ज्यादा अंक, उतना होशियार बच्चा.
माता पिता होना एक सुखद अनुभव होता है और बच्चों की परवरिश कोई आसान नहीं होती. बिना अपेक्षा के दुनिया में बहुत कम कार्य ही किये जाते हैं और अगर कोई माता पिता अपने बच्चे से कुछ अपेक्षा करते हैं तो वो किसी भी प्रकार से गलत नहीं है.
लेकिन....
१-ये 'कुछ' कुछ न रह कर 'सब कुछ' बन जाता है.
२-हर जगह कुछ अतिरिक्त प्रतिभावान बच्चे होते हैं. उनसे अपने बच्चे की तुलना उसका  मनोबल गिराना ही है.
३-बच्चे किसी न किसी क्षेत्र में अवश्य बेहतर होंगे. उनकी वो प्रतिभा ढूँढ निकालें.
४-आपकी अपेक्षाएं वो ऊर्जा होनी चाहियें जो उसे ऊपर जाने को प्रेरित करें न कि पत्थर जो उसे डर के मारे आगे ही न बढ़ने दें.
चलिए आपसे कुछ प्रश्न करते हैं -
१-आप हर  वर्ष  टॉपर्स की लिस्ट अखबार में देखते हैं. क्या आपको पिछले टॉपर्स का नाम याद है?
२-आपने कभी भी किस ऊँची नौकरी करने वाले मशहूर व्यक्ति के बारे में ये सुना है कि ये अपने जिले छोडो, स्कूल का भी बेहतरीन छात्र या छात्रा रहा हो.
३-इतिहास से ऐसे दस नाम ढूँढ कर निकालिए जो अपनी शिक्षा के कारण मशहूर हुए हों.
४-क्या आप स्वयं वही बनने के सपने देखते थे जो आज आप अपनी संतान को बनाना चाहते हैं?
                                   उम्मीद है आप समझ गए होंगे कि आप दरअसल बच्चे को आगे बढ़ना देखना चाहने के बहाने उस पर वो इच्छाएं थोप रहे हैं जो आपके मन में रह गईं. इस तरह से बच्चा उस दिशा में भी कुछ नहीं कर पा रहा जहाँ वो कर सकता है और आपकी दिखाई गई राह पहले ही उसके लिए दुष्कर है.
तो अब मेरा अनुरोध है.बच्चे  को स्वयं विकसित होने दें, उसकी पसंद और  नापसंद पर नजर रखें. उसे उसी दिशा में प्रोत्साहन दें जिस दिशा में उसका रुझान है. विशवास कीजिये, आज हर क्षेत्र में बहुत अवसर हैं.
और एक भरोसा और रखें-
'आपका बच्चा पड़ोसी और मोहल्ले का ही नहीं, शहर का सबसे बेहतरीन बच्चा है. और भारत का भी.'




Saturday, May 7, 2016

पीछे धक्का मारती गिनती

भारत किसी और मामले में हो न हो, जनसँख्या के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर तो है ही. इस मामले में चीन पहले नंबर पर आता है जहाँ की जनसँख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है.
इस नंबर खेल को समझने से पहले ये भी समझ लें कि चीन दुनिया में क्षेत्रफल के अनुसार दूसरे स्थान पर है और भारत सातवें. तो ऐसे समझिए कि जनसँख्या घनत्व यानि प्रति किलोमीटर बसने वाले लोगों की संख्या के अनुसार तो भारत पहले स्थान पर ही है.
अब इन दोनों देशों की इच्छाशक्ति पर भी ध्यान दें जरा. चीन ने वर्षों पहले बढ़ती जनसँख्या के खतरे को भांप लिया था और १९९० में ही ये कानून लागू कर दिया था कि जिस दंपत्ति के भी एक से अधिक बच्चे होंगे, उसे न केवल कई तरह के कर चुकाने होंगे बल्कि उसके लिए कई प्रतिबन्ध भी लागू होंगे. इसके विपरीत अगर केवल एक ही बच्चा है तो उसका पूरा ध्यान सरकार रखेगी.
अब भारत में एक तो छोडो, कोई तीन या चार बच्चों तक पर ये कानून लाकर दिखा दे. कानून की भी बात मत कीजिये, कोई केवल ये कह कर ही दिखा दे कि हमें बच्चे कम पैदा करने चाहियें और ये देश की सेहत के लिए अच्छा नहीं है.
हमारे यहाँ तो 'जिसने मुहँ दिया है वो खाने को दाना भी देगा' की तर्ज़ पर जितने बच्चे पैदा कर लिए जाएँ कम हैं. पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी 'बस एक लड़का हो जाए' के चक्कर में दो तो पैदा कर ही लेता है. लड़कियों के प्रति समाज का रवैया भी इसका कारण है.
अब ज्यादा संताने समाज में अपराध, भ्रष्टाचार और भुखमरी का शुरूआती कारण हो सकती हैं. अधिक लोग मतलब अधिक बेरोजगारी. समाज में बढ़ती रोटी और रोज़गार की प्रतिस्पर्धा का मूल कारण.
साथ ही ये एक ऐसा विषय है जिस पर किये गए कार्य का परिणाम वर्षों बाद दिखाई पड़ता है. चीन में भी २०१६ में जनता को दो बच्चों की इजाजत मिली है. तो भारत में शुरू किया गया कोई भी प्रयास वर्षों बाद अपने रंग दिखायेगा.
वो भी तब जब वो आज ही शुरू कर दिया जाए.



Friday, May 6, 2016

अब भी उतने ही अंधविश्वासी

'छींक आ गई तो रुक जाओ अभी'
'कांच टूटना अशुभ है.'
'तेरहवीं मंजिल पर मकान नहीं लेंगे.'
'बिल्ली रास्ता काट गई. थोड़ी देर बाद निकलना.'
इतने, इतने, इतने समय बाद भी हम उतने ही अंधविश्वासी हैं जितने सैकड़ों वर्ष पहले हुआ करते थे. तकनीक आ गई है और हम हम कहीं ज्यादा वैश्विक हो गए हैं. तो हमने इस वैश्विकता से क्या सीखा? सीखा न! अब हमने  विश्व भर के अंधविश्वासों को अपने दैनिक जीवन में शामिल कर लिया है.
मुझे कभी इस अन्धविश्वास का कारण नहीं समझ आया. मुझे तो लगता है कि अगर आप किसी भी प्रकार से ईश्वर में विश्वास करते हैं और उसे सर्वशक्तिमान मानते हैं तो फिर आप किसी भी प्रकार की 'होनी' या 'अनहोनी' को कैसे बदल सकते हैं? अगर आप ऐसा करने का प्रयास भी कर रहे हैं तो ये परोक्ष रूप से ईश्वर की सत्ता में दखल ही हुआ.
शादी होगी, कुंडली देख कर. दुकान खुलेगी, मुहूर्त देख कर. नेताजी चुनाव का परचा भरेंगे, शुभ लग्न में. गंडे, तावीज़, पत्थर, धागा, टोटका, मन्त्र, झाड़-फूंक क्या उपाय नहीं करते हम केवल इसलिए कि हम उन सभी दुर्योगों से बच जाएँ जो हम पर आने वाले हैं. परिणाम यही होता है कि हमें हमारे भविष्य के दुर्भाग्य से बचाने या कम से कम उसकी मार का असर कम करने वाले 'ठेकेदारों' की फ़ौज खड़ी हो गई है. इनकी कोई जवाबदेही नहीं होती, ये आपको इस प्रकार से बातें बताते हैं कि भविष्य में उन शब्दों के कई अर्थ बनने की गुंजाईश बनी रहे. लागत कुछ नहीं और मुनाफा चकाचक.
फिर से सोचिये, ईश्वर की इच्छा हम बदल नहीं सकते और आने वाले दुर्भाग्य या सौभाग्य किसी को भी टाल नहीं सकते. हम तो बस एक काम कर सकते हैं, वो है अपना कर्म. अगर किसी भी प्रकार से आने वाला बुरा वक़्त टल सकता तो आज कोई भी भारतीय किसी भी प्रकार से दुखी ना होता और न ही किसी पर कोई विपदा आई होती. अन्धविश्वास, एक तर्कहीन और बेतुका विश्वास है जो हमारे मस्तिष्क में भय बन कर वास करता है. इससे न केवल हमारा जीवन बल्कि हमसे जुड़े लोगों का जीवन भी प्रभावित होता है. ध्यान रखिये, अच्छे काम शुरू करने के लिए कोई भी मुहूर्त शुभ होता है और गलत काम की शुरुआत के लिए कोई भी समय सही नहीं होता.
उम्मीद है आप सोचेंगे जरूर. भले ही उस काली बिल्ली के आँखों से ओझल हो जाने के बाद.





Thursday, May 5, 2016

खुशियाँ खंगालता दिखावा

क्या आपके घर में किसी का जन्मदिन है, शादी है या कोई ऐसा ही पारिवारिक उत्सव? हम भारतीय खुशियाँ मनाते हैं और जम कर मनाते हैं लेकिन ये विषय शोचनीय तब बन जाता है जब हम कुछ पल की खुशियों के लिए आगे का ध्यान रखना भूल जाते हैं.
भारत में शादियाँ धीरे धीरे एक बड़ा खर्चीला आयोजन बनती जा रही हैं. समस्या ये है कि इन्हें आपकी हैसियत से जोड़ा जाता है. मतलब ये कि जितनी शानदार शादी, उतना ही ज्यादा आपका रुतबा. इसका परिणाम ये हो रहा है कि लोग कर्ज लेकर भी शादियों में खर्च करने से गुरेज़ नहीं कर रहे हैं. जो लोग पहले ही पैसे वाले हैं, वो भी अपने जमा जोड़े का एक बड़ा हिस्सा शादियों में खर्च कर देते हैं.
भारत एक विशाल जनसँख्या वाला देश है और अगर यहाँ जनमानस से जुड़ी कोई भी हवा फैलती है तो ये बढ़ी हुई जनसंख्या उसे आंधी में बदल देती है. ऐसे में जिस देश में हजारों की संख्या में रोज शादियाँ हो रही हों और हर शादी में कुछ हजार की फिजूलखर्ची भी जोड़ ली जाए तो ये रोजाना करोणों की रकम बैठती है.
शादी तो शादी, सगाई, जन्मदिन, वर्षगाँठ यहाँ तक कि मृत्युभोज भी भारतीयों की नाक बन गया है मानो. यहाँ कमी हुई नहीं और आपकी जीवन भर की प्रतिष्ठा गई नहीं. हम भूल जाते हैं कि जीवन कभी रुकता नहीं. ये हर शादी, सगाई, जन्मदिन और अन्य त्योहारों के बाद भी चलता रहता है. अगर अपने सभी संसाधन इसी पर लुटा देंगे तो आगे हमें किसी के आगे हाथ फैलाना पड़ सकता है. चलिए, मान लेते हैं कि आप बहुत पैसे वाले हैं और आपके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता. पर क्या आपने कभी एक बार भी सोचा है कि जितनी रकम आपके घरेलु समारोह में 'अतिरिक्त' के रूप में खर्च हो गई वो कितने ही लोगों के लिए एक थाती थी? खुशियाँ तो वही हैं जो सबके साथ मनाई जाएँ. आपकी ओर से बढ़े मदद के हाथ किसी और की शादी करवा सकते थे या फिर एक गरीब बच्चे को स्कूल में पढ़ा सकते थे.
पर आपको अभी ये ही अफ़सोस हो रहा है कि पचास लाख वाला बारातघर लेना पड़ा.....
अगर 'महंगा वाला बारातघर' पहले से बुक न होता तो इस 'सस्ते' से काम चलाते भला?????




Monday, May 2, 2016

आज भी आले और यंत्र के पीछे

पोस्ट मई २०१६ में लिखा जा रहा है. दुनिया भर में नए व्यापार, व्यवसाय और नौकरियां पनप रही हैं. ऐसा नहीं है कि भारत इनसे अछूता है. लेकिन आज भी आप किसी भारतीय माता-पिता से पूछेंगे कि वो अपने बच्चों को क्या बनाना चाहेंगे तो आधे से अधिक का उत्तर 'डॉक्टर, इंजिनियर या आई.ए.एस. और पी.सी.एस.' ही होगा.
क्यों? दरअसल ये हमारे दिमागों में रहते हैं. हम कुछ खास नौकरियों या व्यवसाय के बारे में ही सोच पाते हैं. शायद इसी का असर है कि हजारों कॉलेज खुल गए जहाँ लाखों विद्यार्थी सपने लिए जाते हैं और लाखों रूपये खर्च करके उन्हें पता लगता है कि अभी तो वो केवल उस नौकरी के काबिल हैं जो वो सामान्य स्नातक पूरा करके पा सकते थे. भला फिर उस अध्ययन का क्या लाभ जिसमे वो लाखों लगा चुके हैं?
यहाँ पर एक बड़ा दोष माता-पिता के हिस्से में भी जाता है. बहुत कम माता-पिता ऐसे हैं जो अपने बच्चे की रूचि को परख कर सही समय पर उसे सही दिशा में निर्देशित कर पाते हैं. जब फैसला लेने का समय होता है तब उसे 'बच्चा' समझा जाता है और जब वो जरा सा समझदार होता है तो वो पाता है कि जिस रास्ते पर उसे मुड़ना था वो तो बहुत पीछे रह गया.
भारत आगे बढ़ रहा है. नौकरियों और व्यवसाय के एक नहीं, एक हज़ार अवसर हैं. अपनी दृष्टि और सोच को इतना संकुचित न करें कि आपकी संतान 'ये नहीं तो कुछ नहीं' वाली स्थिति में पहुँच जाए बल्कि उसे इस प्रकार तैयार करें कि वो हर स्थिति से बेहतरीन पाने की स्थिति में हो. ये कोई बहुत कठिन बात नहीं. कोई काम छोटा नहीं होता और छोटे दिखाई पड़ने वाले कई काम वास्तव में बहुत मुनाफे का सुदा हो सकते हैं. इस बारे में मेरी ओर से कोई सुझाव या निर्देश नहीं, बस आप अपने आस पास ध्यान से देखिये. सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा.
पर वो समय तभी आएगा जब आप पड़ोसियों की संतानों से अपनी संतान को बेहतर समझना शुरू कर देंगे. ये तो वो रेस है जो मैदान से बाहर होकर आराम से जीती जा सकती है.



Sunday, May 1, 2016

जो दिखता है वो क्या है

आज मेरा इरादा आप सबका ध्यान उस तरफ आकर्षित करने का है जो हम और आप रोज देखते हैं पर कभी उसके अधोलिखित पक्ष पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि हमें उसकी आदत पड़ चुकी होती है. हाँ, हमें ये अंतर तब पता लगता है जब हम किसी विदेशी रमणीय स्थल की फोटो देखते हैं और बरबस ही बोल उठते हैं- 'वाह! क्या खूबसूरत जगह है.' या फिर भारत के किसी चुने हुए हिस्से को देख कर कह उठते हैं- 'इतना सुन्दर? ये भारत में ही है?'
'भारत का नहीं लगता.' कभी सोचा आपने ऐसा क्यों कहा? दरअसल हम भारत में बेतरतीब दृश्यों के आदि हो गए हैं. दुकानों के बाहर सड़कों पर निकले सामान, बेतरतीबी से लगे होर्डिंग, नियम कायदे तोड़ कर चलती भीड़, कहीं भी जगह घेर कर खड़े टेम्पो, ठेले और रिक्शेवाले. ऐसे दृश्य हमारे दिलों में बस चुके हैं. तभी तो तरतीब से लगा हुआ सामान और योजनाबद्ध, सुन्दर निर्माण हमें भौचक्का कर देता है.
मेरी नज़र में ये भी प्रदूषण का एक प्रकार है और मैंने इसे 'दृश्य प्रदूषण' का नाम दिया है. भारत में ये दृश्य प्रदूषण आम है. इतना सार्वजनिक कि हम एक सधे, सजे और त्रुटिरहित शहर की कल्पना भी मुश्किल से ही कर पायंगे. हमारे घर से ही शुरू कर सकते हैं. क्या घर के बाहर कपड़े टांगते हुए हम सोचते हैं? जहाँ जगह मिली, रस्सी बंधी और टंग गए कच्छे, बनियान उसके ऊपर. घर के बाहर क्यारी में भी इसका उदाहरण देखने को मिल जाएगा जहाँ यूँ लगता है मानो पौधों की क्यारी नहीं 'खिचड़ी' लगा रखी हो.
गाड़ी पार्किंग के लिए जहाँ जगह मिलेगी, लगा दी जायेगी.
साथ ही खुले बाजारों, मेलों और नुमाइशों की संस्कृति अपने लाचार प्रबंधन की वजह से आयोजन कम और 'भीड़-भडक्का, धक्कम-धक्का' ज्यादा बन जाती है.
इस प्रदूषण से भारत को बचाने के लिए हमें निर्माण स्तर से सोचना होगा. बेहतर बनाएँ और उसका बेहतरीन प्रबंधन करें. तभी तो दुनिया को भारत का सौंदर्य दिखेगा. और ये तथ्य तो आप सभी जानते हैं-
'जो दिखता है वो बिकता है.'





सबसे कम औकात की सेहत


भारत में विश्व के एक बड़े  मधुमेह रोगियों की संख्या रहती है. मोटापा हमारी अंतर्राष्ट्रीय बीमारी समझिए. साथ ही भूख और कुपोषण से ग्रसित लोगों का तो अच्छा खासा प्रतिशत है ही.
भूख और कुपोषण तो निर्धनता के कारण है और इसके लिए हमें अपने देश की आर्थिक विकास दर पर ध्यान देना होगा लेकिन मधुमेह और मोटापा एवं अनियमित स्वस्थ्य की समस्याएं तो निश्चित रूप से हमारी जीवन शैली की दें हैं. कुछ हद तक इसमें हमारे परमपरागत खाद्य पदार्थ भी शामिल हैं और साथ ही हमारी सेहत के प्रति लापरवाही भी.
जरा हमारे उन व्यंजनों पर ध्यान दें जो हमारे मुहँ में पानी ला देते हैं.
पूरी, कचौरी, हलवा, समोसा, जलेबी, मिठाइयां आदि. ये सब वास्तव में चीनी या तेल से पगे व्यंजन हैं जो दिल और सेहत के लिए अत्यंत नुकसानदायक हैं. दूसरा इन्हें बनाने का ढंग. अधिकतर ये एक ही तेल में बार बार तले जाते हैं और फिर जहर बन चुका वो तेल हमारी आँतों में उतर जाता है. वैसे सेहत के मानकों पर पिज्जा, नूडल्स और ब्रेड भी कम खतरनाक नहीं.



भारत में खाद्य मानकों का कितना ध्यान रखा जाता है इसका सबसे अच्छा उदाहरण कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले हुए सड़क किनारे खड़े ठेले हैं. लगभग सैकड़ों तरह के खाद्य पदार्थ बेचने वाले ये ठेले वाले न तो खाने की सफाई का ध्यान रखते हैं, न अपने बर्तनों की और न खुद की. सत्य तो ये है कि ये ठेले जीवाणुओं और कीटाणुओं की चलती फिरती दुकान हैं और अगर इनकी संख्या से अनुमान लगाया जाए तो भारत में करोणों लोग इनसे लिया खाना खाते हैं.
तीसरा कारण है हमारा जीवन जीने का ढंग. सुबह ब्रेड खाकर निकाल जाओ, दिन दो-चार समोसों या बिस्कुट के पैकेट पर निकाल दो और खाने का कोई नियत समय न होना. रही सही कसर इस वजह से पूरी हो जाती है कि कसरत के लिए हमारे पास दस मिनट का भी समय नहीं होता.
हल बहुत ही आसान है. अपने खाने का नियत समय बनाएँ और खाने के समय पर खाना ही खाएं, कुछ 'उल्टा सीधा' नहीं. अगर भागते दौड़ते, घर से बाहर खाने की नौबत आये तो किसी अच्छे होटल ढाबे या फिर फलों को तरजीह दें. देश के हालात के बारे में घंटों बहस करने के बाद या पहले दस मिनट अपने व्यायाम के लिए भी निकाल लें. दिन भर एक जगह बैठे न रहें, थोड़ा टहलें घूमे भी. ये उपाय इतने मुश्किल नहीं.
अपने गोलगप्पे खत्म होने के बाद इनके बारे में सोचियेगा जरूर. क्योंकि भारत की सेहत अच्छी होगी तो अच्छा दिमाग भी चलेगा.