Sunday, May 1, 2016

सबसे कम औकात की सेहत


भारत में विश्व के एक बड़े  मधुमेह रोगियों की संख्या रहती है. मोटापा हमारी अंतर्राष्ट्रीय बीमारी समझिए. साथ ही भूख और कुपोषण से ग्रसित लोगों का तो अच्छा खासा प्रतिशत है ही.
भूख और कुपोषण तो निर्धनता के कारण है और इसके लिए हमें अपने देश की आर्थिक विकास दर पर ध्यान देना होगा लेकिन मधुमेह और मोटापा एवं अनियमित स्वस्थ्य की समस्याएं तो निश्चित रूप से हमारी जीवन शैली की दें हैं. कुछ हद तक इसमें हमारे परमपरागत खाद्य पदार्थ भी शामिल हैं और साथ ही हमारी सेहत के प्रति लापरवाही भी.
जरा हमारे उन व्यंजनों पर ध्यान दें जो हमारे मुहँ में पानी ला देते हैं.
पूरी, कचौरी, हलवा, समोसा, जलेबी, मिठाइयां आदि. ये सब वास्तव में चीनी या तेल से पगे व्यंजन हैं जो दिल और सेहत के लिए अत्यंत नुकसानदायक हैं. दूसरा इन्हें बनाने का ढंग. अधिकतर ये एक ही तेल में बार बार तले जाते हैं और फिर जहर बन चुका वो तेल हमारी आँतों में उतर जाता है. वैसे सेहत के मानकों पर पिज्जा, नूडल्स और ब्रेड भी कम खतरनाक नहीं.



भारत में खाद्य मानकों का कितना ध्यान रखा जाता है इसका सबसे अच्छा उदाहरण कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले हुए सड़क किनारे खड़े ठेले हैं. लगभग सैकड़ों तरह के खाद्य पदार्थ बेचने वाले ये ठेले वाले न तो खाने की सफाई का ध्यान रखते हैं, न अपने बर्तनों की और न खुद की. सत्य तो ये है कि ये ठेले जीवाणुओं और कीटाणुओं की चलती फिरती दुकान हैं और अगर इनकी संख्या से अनुमान लगाया जाए तो भारत में करोणों लोग इनसे लिया खाना खाते हैं.
तीसरा कारण है हमारा जीवन जीने का ढंग. सुबह ब्रेड खाकर निकाल जाओ, दिन दो-चार समोसों या बिस्कुट के पैकेट पर निकाल दो और खाने का कोई नियत समय न होना. रही सही कसर इस वजह से पूरी हो जाती है कि कसरत के लिए हमारे पास दस मिनट का भी समय नहीं होता.
हल बहुत ही आसान है. अपने खाने का नियत समय बनाएँ और खाने के समय पर खाना ही खाएं, कुछ 'उल्टा सीधा' नहीं. अगर भागते दौड़ते, घर से बाहर खाने की नौबत आये तो किसी अच्छे होटल ढाबे या फिर फलों को तरजीह दें. देश के हालात के बारे में घंटों बहस करने के बाद या पहले दस मिनट अपने व्यायाम के लिए भी निकाल लें. दिन भर एक जगह बैठे न रहें, थोड़ा टहलें घूमे भी. ये उपाय इतने मुश्किल नहीं.
अपने गोलगप्पे खत्म होने के बाद इनके बारे में सोचियेगा जरूर. क्योंकि भारत की सेहत अच्छी होगी तो अच्छा दिमाग भी चलेगा.

No comments:

Post a Comment