Sunday, May 1, 2016

जो दिखता है वो क्या है

आज मेरा इरादा आप सबका ध्यान उस तरफ आकर्षित करने का है जो हम और आप रोज देखते हैं पर कभी उसके अधोलिखित पक्ष पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि हमें उसकी आदत पड़ चुकी होती है. हाँ, हमें ये अंतर तब पता लगता है जब हम किसी विदेशी रमणीय स्थल की फोटो देखते हैं और बरबस ही बोल उठते हैं- 'वाह! क्या खूबसूरत जगह है.' या फिर भारत के किसी चुने हुए हिस्से को देख कर कह उठते हैं- 'इतना सुन्दर? ये भारत में ही है?'
'भारत का नहीं लगता.' कभी सोचा आपने ऐसा क्यों कहा? दरअसल हम भारत में बेतरतीब दृश्यों के आदि हो गए हैं. दुकानों के बाहर सड़कों पर निकले सामान, बेतरतीबी से लगे होर्डिंग, नियम कायदे तोड़ कर चलती भीड़, कहीं भी जगह घेर कर खड़े टेम्पो, ठेले और रिक्शेवाले. ऐसे दृश्य हमारे दिलों में बस चुके हैं. तभी तो तरतीब से लगा हुआ सामान और योजनाबद्ध, सुन्दर निर्माण हमें भौचक्का कर देता है.
मेरी नज़र में ये भी प्रदूषण का एक प्रकार है और मैंने इसे 'दृश्य प्रदूषण' का नाम दिया है. भारत में ये दृश्य प्रदूषण आम है. इतना सार्वजनिक कि हम एक सधे, सजे और त्रुटिरहित शहर की कल्पना भी मुश्किल से ही कर पायंगे. हमारे घर से ही शुरू कर सकते हैं. क्या घर के बाहर कपड़े टांगते हुए हम सोचते हैं? जहाँ जगह मिली, रस्सी बंधी और टंग गए कच्छे, बनियान उसके ऊपर. घर के बाहर क्यारी में भी इसका उदाहरण देखने को मिल जाएगा जहाँ यूँ लगता है मानो पौधों की क्यारी नहीं 'खिचड़ी' लगा रखी हो.
गाड़ी पार्किंग के लिए जहाँ जगह मिलेगी, लगा दी जायेगी.
साथ ही खुले बाजारों, मेलों और नुमाइशों की संस्कृति अपने लाचार प्रबंधन की वजह से आयोजन कम और 'भीड़-भडक्का, धक्कम-धक्का' ज्यादा बन जाती है.
इस प्रदूषण से भारत को बचाने के लिए हमें निर्माण स्तर से सोचना होगा. बेहतर बनाएँ और उसका बेहतरीन प्रबंधन करें. तभी तो दुनिया को भारत का सौंदर्य दिखेगा. और ये तथ्य तो आप सभी जानते हैं-
'जो दिखता है वो बिकता है.'





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