Monday, May 2, 2016

आज भी आले और यंत्र के पीछे

पोस्ट मई २०१६ में लिखा जा रहा है. दुनिया भर में नए व्यापार, व्यवसाय और नौकरियां पनप रही हैं. ऐसा नहीं है कि भारत इनसे अछूता है. लेकिन आज भी आप किसी भारतीय माता-पिता से पूछेंगे कि वो अपने बच्चों को क्या बनाना चाहेंगे तो आधे से अधिक का उत्तर 'डॉक्टर, इंजिनियर या आई.ए.एस. और पी.सी.एस.' ही होगा.
क्यों? दरअसल ये हमारे दिमागों में रहते हैं. हम कुछ खास नौकरियों या व्यवसाय के बारे में ही सोच पाते हैं. शायद इसी का असर है कि हजारों कॉलेज खुल गए जहाँ लाखों विद्यार्थी सपने लिए जाते हैं और लाखों रूपये खर्च करके उन्हें पता लगता है कि अभी तो वो केवल उस नौकरी के काबिल हैं जो वो सामान्य स्नातक पूरा करके पा सकते थे. भला फिर उस अध्ययन का क्या लाभ जिसमे वो लाखों लगा चुके हैं?
यहाँ पर एक बड़ा दोष माता-पिता के हिस्से में भी जाता है. बहुत कम माता-पिता ऐसे हैं जो अपने बच्चे की रूचि को परख कर सही समय पर उसे सही दिशा में निर्देशित कर पाते हैं. जब फैसला लेने का समय होता है तब उसे 'बच्चा' समझा जाता है और जब वो जरा सा समझदार होता है तो वो पाता है कि जिस रास्ते पर उसे मुड़ना था वो तो बहुत पीछे रह गया.
भारत आगे बढ़ रहा है. नौकरियों और व्यवसाय के एक नहीं, एक हज़ार अवसर हैं. अपनी दृष्टि और सोच को इतना संकुचित न करें कि आपकी संतान 'ये नहीं तो कुछ नहीं' वाली स्थिति में पहुँच जाए बल्कि उसे इस प्रकार तैयार करें कि वो हर स्थिति से बेहतरीन पाने की स्थिति में हो. ये कोई बहुत कठिन बात नहीं. कोई काम छोटा नहीं होता और छोटे दिखाई पड़ने वाले कई काम वास्तव में बहुत मुनाफे का सुदा हो सकते हैं. इस बारे में मेरी ओर से कोई सुझाव या निर्देश नहीं, बस आप अपने आस पास ध्यान से देखिये. सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा.
पर वो समय तभी आएगा जब आप पड़ोसियों की संतानों से अपनी संतान को बेहतर समझना शुरू कर देंगे. ये तो वो रेस है जो मैदान से बाहर होकर आराम से जीती जा सकती है.



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