Thursday, May 5, 2016

खुशियाँ खंगालता दिखावा

क्या आपके घर में किसी का जन्मदिन है, शादी है या कोई ऐसा ही पारिवारिक उत्सव? हम भारतीय खुशियाँ मनाते हैं और जम कर मनाते हैं लेकिन ये विषय शोचनीय तब बन जाता है जब हम कुछ पल की खुशियों के लिए आगे का ध्यान रखना भूल जाते हैं.
भारत में शादियाँ धीरे धीरे एक बड़ा खर्चीला आयोजन बनती जा रही हैं. समस्या ये है कि इन्हें आपकी हैसियत से जोड़ा जाता है. मतलब ये कि जितनी शानदार शादी, उतना ही ज्यादा आपका रुतबा. इसका परिणाम ये हो रहा है कि लोग कर्ज लेकर भी शादियों में खर्च करने से गुरेज़ नहीं कर रहे हैं. जो लोग पहले ही पैसे वाले हैं, वो भी अपने जमा जोड़े का एक बड़ा हिस्सा शादियों में खर्च कर देते हैं.
भारत एक विशाल जनसँख्या वाला देश है और अगर यहाँ जनमानस से जुड़ी कोई भी हवा फैलती है तो ये बढ़ी हुई जनसंख्या उसे आंधी में बदल देती है. ऐसे में जिस देश में हजारों की संख्या में रोज शादियाँ हो रही हों और हर शादी में कुछ हजार की फिजूलखर्ची भी जोड़ ली जाए तो ये रोजाना करोणों की रकम बैठती है.
शादी तो शादी, सगाई, जन्मदिन, वर्षगाँठ यहाँ तक कि मृत्युभोज भी भारतीयों की नाक बन गया है मानो. यहाँ कमी हुई नहीं और आपकी जीवन भर की प्रतिष्ठा गई नहीं. हम भूल जाते हैं कि जीवन कभी रुकता नहीं. ये हर शादी, सगाई, जन्मदिन और अन्य त्योहारों के बाद भी चलता रहता है. अगर अपने सभी संसाधन इसी पर लुटा देंगे तो आगे हमें किसी के आगे हाथ फैलाना पड़ सकता है. चलिए, मान लेते हैं कि आप बहुत पैसे वाले हैं और आपके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता. पर क्या आपने कभी एक बार भी सोचा है कि जितनी रकम आपके घरेलु समारोह में 'अतिरिक्त' के रूप में खर्च हो गई वो कितने ही लोगों के लिए एक थाती थी? खुशियाँ तो वही हैं जो सबके साथ मनाई जाएँ. आपकी ओर से बढ़े मदद के हाथ किसी और की शादी करवा सकते थे या फिर एक गरीब बच्चे को स्कूल में पढ़ा सकते थे.
पर आपको अभी ये ही अफ़सोस हो रहा है कि पचास लाख वाला बारातघर लेना पड़ा.....
अगर 'महंगा वाला बारातघर' पहले से बुक न होता तो इस 'सस्ते' से काम चलाते भला?????




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