भारत किसी और मामले में हो न हो, जनसँख्या के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर तो है ही. इस मामले में चीन पहले नंबर पर आता है जहाँ की जनसँख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है.
इस नंबर खेल को समझने से पहले ये भी समझ लें कि चीन दुनिया में क्षेत्रफल के अनुसार दूसरे स्थान पर है और भारत सातवें. तो ऐसे समझिए कि जनसँख्या घनत्व यानि प्रति किलोमीटर बसने वाले लोगों की संख्या के अनुसार तो भारत पहले स्थान पर ही है.
अब इन दोनों देशों की इच्छाशक्ति पर भी ध्यान दें जरा. चीन ने वर्षों पहले बढ़ती जनसँख्या के खतरे को भांप लिया था और १९९० में ही ये कानून लागू कर दिया था कि जिस दंपत्ति के भी एक से अधिक बच्चे होंगे, उसे न केवल कई तरह के कर चुकाने होंगे बल्कि उसके लिए कई प्रतिबन्ध भी लागू होंगे. इसके विपरीत अगर केवल एक ही बच्चा है तो उसका पूरा ध्यान सरकार रखेगी.
अब भारत में एक तो छोडो, कोई तीन या चार बच्चों तक पर ये कानून लाकर दिखा दे. कानून की भी बात मत कीजिये, कोई केवल ये कह कर ही दिखा दे कि हमें बच्चे कम पैदा करने चाहियें और ये देश की सेहत के लिए अच्छा नहीं है.
हमारे यहाँ तो 'जिसने मुहँ दिया है वो खाने को दाना भी देगा' की तर्ज़ पर जितने बच्चे पैदा कर लिए जाएँ कम हैं. पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी 'बस एक लड़का हो जाए' के चक्कर में दो तो पैदा कर ही लेता है. लड़कियों के प्रति समाज का रवैया भी इसका कारण है.
अब ज्यादा संताने समाज में अपराध, भ्रष्टाचार और भुखमरी का शुरूआती कारण हो सकती हैं. अधिक लोग मतलब अधिक बेरोजगारी. समाज में बढ़ती रोटी और रोज़गार की प्रतिस्पर्धा का मूल कारण.
साथ ही ये एक ऐसा विषय है जिस पर किये गए कार्य का परिणाम वर्षों बाद दिखाई पड़ता है. चीन में भी २०१६ में जनता को दो बच्चों की इजाजत मिली है. तो भारत में शुरू किया गया कोई भी प्रयास वर्षों बाद अपने रंग दिखायेगा.
वो भी तब जब वो आज ही शुरू कर दिया जाए.
इस नंबर खेल को समझने से पहले ये भी समझ लें कि चीन दुनिया में क्षेत्रफल के अनुसार दूसरे स्थान पर है और भारत सातवें. तो ऐसे समझिए कि जनसँख्या घनत्व यानि प्रति किलोमीटर बसने वाले लोगों की संख्या के अनुसार तो भारत पहले स्थान पर ही है.
अब इन दोनों देशों की इच्छाशक्ति पर भी ध्यान दें जरा. चीन ने वर्षों पहले बढ़ती जनसँख्या के खतरे को भांप लिया था और १९९० में ही ये कानून लागू कर दिया था कि जिस दंपत्ति के भी एक से अधिक बच्चे होंगे, उसे न केवल कई तरह के कर चुकाने होंगे बल्कि उसके लिए कई प्रतिबन्ध भी लागू होंगे. इसके विपरीत अगर केवल एक ही बच्चा है तो उसका पूरा ध्यान सरकार रखेगी.अब भारत में एक तो छोडो, कोई तीन या चार बच्चों तक पर ये कानून लाकर दिखा दे. कानून की भी बात मत कीजिये, कोई केवल ये कह कर ही दिखा दे कि हमें बच्चे कम पैदा करने चाहियें और ये देश की सेहत के लिए अच्छा नहीं है.
हमारे यहाँ तो 'जिसने मुहँ दिया है वो खाने को दाना भी देगा' की तर्ज़ पर जितने बच्चे पैदा कर लिए जाएँ कम हैं. पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी 'बस एक लड़का हो जाए' के चक्कर में दो तो पैदा कर ही लेता है. लड़कियों के प्रति समाज का रवैया भी इसका कारण है.
अब ज्यादा संताने समाज में अपराध, भ्रष्टाचार और भुखमरी का शुरूआती कारण हो सकती हैं. अधिक लोग मतलब अधिक बेरोजगारी. समाज में बढ़ती रोटी और रोज़गार की प्रतिस्पर्धा का मूल कारण.
साथ ही ये एक ऐसा विषय है जिस पर किये गए कार्य का परिणाम वर्षों बाद दिखाई पड़ता है. चीन में भी २०१६ में जनता को दो बच्चों की इजाजत मिली है. तो भारत में शुरू किया गया कोई भी प्रयास वर्षों बाद अपने रंग दिखायेगा.
वो भी तब जब वो आज ही शुरू कर दिया जाए.


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